नोट पर छपी रानी की वाव को संवारा था भोपाल के पुरातत्वविद् ने

नोट पर छपी रानी की वाव को संवारा था भोपाल के पुरातत्वविद् ने

Dinesh Bhadauria | Publish: Sep, 03 2018 03:19:00 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

नोट पर छपी रानी की वाव को संवारा था भोपाल के पुरातत्वविद् ने

भोपाल. भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए सौ रुपए के नए नोट में जिस रानी की वाव [बावड़ी] का चित्र अंकित है, उसकी संरक्षण कार्य राजधानी के ख्यात पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास ने किया था। इस स्मारक को वल्र्ड हेरिटेज का दर्जा दिलवाने में भी उनका अहम योगदान रहा है। यह एकमात्र ऐसा स्मारक है, जिस एक स्मारक पर ही किसी को देश की पहली और एकमात्र पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई है। इससे इस स्मारक की भव्यता और महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ। नारायण व्यास भारतीय पुरातत्व में तैनात थे। वर्ष 1981 से 11 88 88 आठ आठ साल वे गुजरात के पाटन जिला स्थितियां रानी की वाव पर संरक्षण कार्य कर रहे थे। गुजरात में बावड़ी को वाव कहते हैं। डॉ। व्यास बताते हैं कि इस बावड़ी को वर्ष 1050 में अनहिलवाड़ पाटन के प्रतापी महाराजा भीमदेव सोलंकी प्रथम की याद में उनके महारानी उदयमती ने बनवाया था। महाराजा भीमदेव सोलंकी ने आक्रमणकारी महमूद गजनवी का सामना किया था। यह सात मंजिला बावड़ी लगभग 200 फीट लंबा, 40 फीट चौड़ी और लगभग 125 फीट गहरी है। इसके जलस्तर 120 फीट पर था।

रानी की वाव सरस्वती नदी के निकट बने सहस्त्रलिंग तालाब के पास स्थित है। नदी की बाढ़ और तालाब के पानी की अधिकता से यह वाव समाप्त सी हो गई थी। तल में बहुत गाद जम गई थी। १९८१ के दशक में एएसआई के दल ने डॉ. व्यास की अगुवाई में इसका संरक्षण कार्य किया।

डॉ. व्यास बताते हैं कि सोलंकी काल की बेजोड़ वास्तु व मूर्तिकला का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। हर तल पर वेशकीमती नक्काशी, देवमूर्तियां, अप्सराओं आदि के चित्रण हैं। इनका संरक्षण कार्य बहुत सावधानी व बारीकी से करना पड़ा। काम करते समय नीचे देखने पर चक्कर आ जाता था। डॉ. व्यास दो बार गिरने से बचे। एक बार तो मचान ही खुल गया था। उनके जीवन का यह बहुत जोखिम भरा काम था, जिसमें हर पल मौत का खतरा सिर पर मंडराता रहता था।

1500 देव मूर्तियां बावड़ी में हैं
इस बावड़ी में 1500 देवमूर्तियां हैं। 11 वीं सदी की ये देवमूर्तियां बहुत अच्छी दशा में मिली थीं। महारानी उदयमती वैष्णव धर्मावलम्बी थां, इस वाव में भगवान विष्णु के विविध अवतारों और स्वरूपों को समर्पित कई देवप्रतिमाएं हैं। बावड़ी में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, हनुमान, दिग्पाल, अप्सरायंस, देवदासियां, विचित्रन, मानव, पशु, देव-दानवों के युद्ध की सैकड़ों छवियां हैं। पूरे गुजरात में इस तरह के शिलावशेष कहीं नहीं हैं। इन मूर्तियों का पूरा डाक्यूमेंटेशन डॉ। व्यास ने किया।
इस वाव में कारीगरों और मूर्तिकारों के 700 से अधिक चिह्न और नाम भी वर्णित हैं। इससे तत्काल साम्राज्य में कारीगरों और मूर्तिकारों का सम्मान पता है।

वल्र्ड हेरिटेज में शामिल
रानी की वाव को 23 जून 2014 को विश्वदाय स्मारक घोषित किया गया। इसके वल्र्ड हेरिटेज में शामिल करने को लेकर एएसआइ मुख्यालय, नई दिल्ली द्वारा किए जाने वाले प्रयासों में डॉ. व्यास की अहम भूमिका रही है। उन्हें बार-बार दस्तावेज व जानकारी के साथ नई दिल्ली बुलाया जाता रहा।

ये चीजें भी हैं खास
इस बावड़ी में गोलाकार शेषशायी विष्णुकूप भी है। इसमें तीन लेवल हैं। शेषनाग पर भगवान विष्णु लेटे हैं। डॉ. व्यास का कहना है कि ये स्तर मौसम के अनुसार बनाए गए होंगे। सबसे ऊंचा जलस्तर बरसात में, इसके बाद सर्दी में और सबसे नीचे गर्मी का जलस्तर रहता होगा। इसी के अनुसार मूर्तियों का अंकन भी किया गया है। इसके अलवा इस बावड़ी में 30 किलोमीटर लंबी एक सुरंग भी मिली है, जो सिधपुर गांव तक जाती है। यह मिट्टी व पत्थरों से ढंक दी गई है।

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