तुम मगन हो नृत्य करते रहे, मांदल की थाप पर झूमते रहे

साहित्य अकादमी की ओर से शुक्रवार को भारत भवन में अनुनाद हिंदी कविता का बहुवचन कार्यक्रम के तहत रचना पाठ का आयोजन हुआ

भोपाल. साहित्य अकादमी की ओर से शुक्रवार को भारत भवन में अनुनाद हिंदी कविता का बहुवचन कार्यक्रम के तहत रचना पाठ का आयोजन हुआ। इस अवसर पर रामचन्द्र सिंह के निर्देशन में तैयार आदि वाद्य वृन्द की सुरम्य प्रस्तुति हुई। कुसुम माधुरी टोप्पो ने दो पाटों में बटी आदिम जाति, एक सवाल, मैं आदिवासी, तोड़ रही वह तेंदु पत्ता, आरक्षण कविताओं का पाठ किया। उन्होंने कविता के अंश सुनाते हुए दो पाटों में बटी आदिम जाति, गुजरे दिन थे, जब उल्लासित होती प्रकृति, करमा सरहुल के पराग झरते रात भर, मजबूती से एक दूसरे का, हाथ पकड़कर... पेश की। इसके बाद विश्वासी एक्का ने सतपुड़ा के जंगल, क्या तुम्हें पता है, तुम्हें पता न चला, लछमनिया का चूल्हा, रुई सी खुशियो, बिरसो आदि कविताओं का पाठ किया। उन्होंने कविता तुम मगन हो नृत्य करते रहे, मांदल की थाप पर झूमते रहे, जंगल भी गाने लगा तुम्हारे साथ, उत्सवधर्मी थे तुम, कोई अंगार रख गया सूखे पत्तों के बीच... सुनाई। वंदना टेटे ने अपनी बात कहते हैं, हम धरती की माड़ हैं, पुरखों का कहन आदि कविताओं का पाठ किया। उन्होंने हम कविता नहीं करते, अपनी बात कहते हैं, जैसे कहती है धरती, आसमान पहाड़... रचना सुनाई। महादेव टोप्पो ने जंगल पहाड़ पुस्तक के माध्यम से पुरुषों और दोस्तों को याद करती कविताएं सुनाईं।

कविताएं कागज पर उकेरने के बाद भाषा बोलती है : जोशी
अध्यक्षता कर रहे कवि राजेश जोशी ने कहा कि 1990 के दशक तक की कविताओं में सभी वर्गों की आवाज रहती थी, किन्तु उसके बाद की कविताओं में दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श जैसे विषय भी शामिल हो गए और नये शब्द आने से हिन्दी भाषा का विस्तार हुआ है। आज देखें तो बहुत सारे विमर्श उठ खड़े हुए हैं। आज सभी कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं में उस भूमि से जुड़ी कतिवाएं सुनाईं, जिसे किस तरह से जन-जंगलों से अलग किया जा रहा है। कविताओं को कागज पर उकेरने के बाद किस-किस तरह से भाषा बोलती है यह कागज की सार्थकता है। आज इस अनुनाद के माध्यम से सभी की कविताओं ने विस्तार दिया और इन सभी की भाषा ने भी हमें समृद्ध किया है।

Pradeep Kumar Sharma
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