भोपाल में आनंदी बेन पटेल ने लाल परेड ग्राउंड में किया ध्वजारोहण, ली परेड की सलामी- video

पूरे प्रदेश में जोश और उमंग से मनाया गया गणतंत्र दिवस,विभिन्न जिलों में मंत्रिमंडल के सदस्यों ने ध्वजारोहण कर मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन किया...

By: दीपेश तिवारी

Published: 26 Jan 2018, 11:24 AM IST

भोपाल। मध्यप्रदेश में गणतंत्र दिवस का मुख्य समारोह राजधानी भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में मनाया गया। यह देश का6उन्हत्तरवां(69वां) गणतंत्र दिवस समारोह है। इसी की तहत शुक्रवार को यानि 26 जनवरी को सुबह राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ध्वजारोहण कर परेड की सलामी लीं। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिह चौहान ने गुना में झंडावंदन किया।

जानिये कहां किसने किया ध्वजारोहण...
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा होशंगाबाद और उपाध्यक्ष राजेंद्र कुमार सिंह सतना में ध्वजारोहण किया। इसके अलावा विभिन्न जिलों में मंत्रिमंडल के सदस्य ध्वजारोहण कर मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन किया।
इधर, राज्य सरकार के मंत्री जयंत मलैया दमोह में, गोपाल भार्गव जबलपुर में, डॉ. गौरीशंकर शेजवार रायसेन में, डॉ. नरोत्तम मिश्रा दतिया में, ओमप्रकाश धुर्वे डिंडौरी में, विजय शाह इंदौर में, गौरीशंकर बिसेन बालाघाट में और रूस्तम सिंह मुरैना में ध्वजारोहण किया।

इसी तरह मंत्री अर्चना चिटनिस बुरहानपुर में, उमाशंकर गुप्ता छिंदवाड़ा में, कुसुम मेहदेले पन्ना में, माया सिंह ग्वालियर में,पारस जैन उज्जैन में, राजेंद्र शुक्ल रीवा में, अंतर सिंह आर्य बड़वानी में, रामपाल सिंह सीहोर में, भूपेंद्र सिंह सागर में, जयभान सिंह पवैया भिंड में, दीपक जोशी देवास में, लाल सिंह आर्य बैतूल में, सुरेंद्र पटवा आगर-मालवा में, संजय सत्येंद्र पाठक कटनी में, ललिता यादव छतरपुर में, विश्वास सारंग राजगढ़ में और सूर्यप्रकाश मीणा विदिशा में गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण कर मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन किया।

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इधर, भज्जू श्याम को पद्म पुरुस्कार:
मध्य प्रदेश के आदिवासी गोंड कलाकार भज्जू श्याम का नाम केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों में शामिल किया है। इस सूची की घोषणा गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले यानि 25 जनवरी को की गई।
ये है कहानी...
कभी सिक्‍योरिटी गार्ड की नौकरी करने वाले भज्जू श्याम ने तमाम मुश्किलों को परास्त कर अपनी कला का पूरी दुनिया में लोह मनवाया। गोंड आर्ट में उन्हें महारत हासिल है। भज्जू श्याम मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास स्थित एक छोटे से गांव पाटनगढ़ के निवासी हैं। भज्जू श्याम का बचपन आदिवासी अंचल में बेहद अभाव के बीच बीता था।

माता-पिता की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि वह अपने बच्चों की छोटी से छोटी ख्वाहिश भी पूरी कर सके. तमाम कोशिशों के बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं आया तो भज्जू श्याम ने 16 साल की उम्र में घर छोड़ दिया।

उन्होंने पहले नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक की राह पकड़ी। यहां कुछ दिन पौधे लगाने का काम किया। हालांकि, इस काम में मन नहीं रमा तो उन्होंने राजधानी भोपाल का रुख कर लिया। यहां उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी में हाथ आजमाया, फिर कुछ दिन इलैक्ट्रिशियन का काम भी किया।

ऐसे बदली जिंदगी...
कहा जाता है कि भतीजे की हालत देख करीब 25 साल पहले 1993 में उनके चाचा और प्रसिद्ध पेंटर जनगढ़ सिंह का दिल पसीज गया। उन्होंने भज्जू श्याम को नौकरी का वादा कर अपने पास बुला लिया, चाचा का यह फैसला उनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
भज्जू को यूं पेंटिंग में कोई महारत हासिल नहीं थी, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वह इस विधा से पूरी से अंजान थे। बचपन में दीवारों को रंगने में मां की मदद का हुनर यहां खूब काम आया। उनकी मां घर की दीवारों पर पारंपरिक चित्र बनाया करती थीं।

भज्जू श्याम मां की मदद के लिए तैयार रहा करते थे। चाचा ने कूची पकड़ाई तो फिर जिंदगी को एक नयी राह मिल गई।
दिल्ली में 1200 रुपए में बिकी पेंटिंग
चाचा के सानिध्य में भज्जू श्याम का हुनर धीरे-धीरे निखरने लगा. कुछ ही दिनों में वह एक लाजवाब आर्टिस्ट बनकर उभरे. अब सफलता भी उनके कदम चूमने लगी थी। मौका था दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शनी का, इस प्रदर्शनी में उनकी पांच पेंटिंग बिकी, जिसमें एवज में उन्हें कुल 1200 रुपए मिले। बेहद मुश्किल दौर को देख चुके इस कलाकार के लिए यह भी बड़ी राशि थी। बस उन्हें तो अपनी कला को मिले प्रतिसाद से जिंदगी की नयी राह मिल गई थी।
भज्जू श्याम का हुनर ऐसा निखरा की उनकी शोहरत भारत की सरहदों को पार कर सात समंदर तक पहुंच गई। पेरिस और लंदन में प्रदर्शनी के दौरान उन्हें फेम भी मिला और जिंदगी का एक नया मकसद भी।

विदेशी भाषाओं में 5 किताब...
2001 में लंदन गए तो दुनिया के इस खूबसूरत शहर से उनका दिल लग गया. दन से आने के बाद भज्जू ने अब तक करीब आठ किताबों का संपादन किया और सैकड़ों की संख्या में चित्र बनाए। भज्जू श्याम की किताब 'लंदन जंगल बुक' दुनिया की पांच विदेशी भाषाओं में पब्लिश हुई है।

गणतंत्र दिवस
दीपेश तिवारी
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