मध्यप्रदेश वन्य-जीव और जैव-विविधता पर्यटन की है संगम स्थली

कान्हा, वांधवगढ़, पेंच, पन्ना और सतपुड़ा जैसे राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है

प्रकृति दर्शन करने वालों की पहली पसंद मध्यप्रदेश

By: Ashok gautam

Published: 25 Sep 2021, 10:02 PM IST


भोपाल : प्रकृति दर्शन करने वालों के लिए मध्यप्रदेश अब पहली पसंद बनता जा रहा है। प्रदेश वन्य-जीव पर्यटन और जैव-विविधता पर्यटन के गंठजोड़ से प्रकृति का नया क्षेत्र बन गया है। बाघ, तेंदुआ, घड़ियाल, गिद्ध, चीतल, बारहसिंगा जैसे वन्य जीव जिस वातावरण में रहते है वे जैव-विविधता के कई लुभावने आयाम प्रस्तुत करते हैं।

कान्हा, वांधवगढ़, पेंच, पन्ना और सतपुड़ा जैसे राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। इनमें पर्यटकों द्वारा अग्रिम बुकिंग कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पिछले दो साल में कोरोना जैसी महामारी के बावजूद कान्हा टाइगर रिजर्व क्षेत्र में लगभग 2 लाख 87 हजार पर्यटकों ने आमद दी और तकरीबन 9.97 करोड़ और पेंच टाइगर रिजर्व में एक लाख 69 हजार पर्यटकों के आने से प्रबंधन को 5 करोड़ 96 लाख रूपये की आय भी हुई। इसी तरह मुरैना जिलें में स्थित ईको सेन्टर देवरी और चम्बल सफारी राजघाट पर 33 हजार पर्यटक का आगमन हुआ। फलस्वरूप प्रबंधन को 2 लाख 20 हजार रूपये की आमदनी हुई। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य घड़ियाल, कछुए, डॉल्फिन और सौ से ज्यादा प्रकार के प्रवासी/अप्रवासी पक्षियों के लिए जाना जाता है।

टाइगर स्टेट

मध्यप्रदेश न सिर्फ देश का बल्कि विश्व के लिए टाइगर का कैपिटल है। कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व में प्रबंधन को देश में उत्कृष्ट माना गया है। पन्ना टाइगर रिजर्व ने बाघों की आबादी बढ़ाने में पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। यह विश्व के समकालीन वन्य-जीव संरक्षण इतिहास में एक अनूठा उदाहरण है। अब तेन्दुओं की संख्या में भी मध्यप्रदेश भारत में सबसे आगे हैं। बाघों की संख्या में वृद्धि के लिए राज्य शासन और वन विभाग निरंतर प्रयासरत है और सक्रिय प्रबंधन के फलस्वरूप बाघों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। मध्य भारत का भू-दृश्य बाघों के अस्तित्व के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश के कॉरिडोर से ही उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के बाघ रिजर्व आपस में जुड़े हुए है।

बाघों का रहवास के लिए लगभग 190 गॉवों का विस्थापन कर बड़े भू-भाग को जैविक दबाव से मुक्त कराया गया है। इस समय कान्हा, पेंच और कूनो पालपुर के कोर क्षेत्र में सभी गॉवों को विस्थापित किया जा चुका है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का 90 प्रतिशत से अधिक कोर क्षेत्र भी जैविक दबाव से मुक्त हो चुका है।

जैव-विविधता पर्यटन

प्रदेश के टाइगर रिजर्व- बॉधवगढ़, पन्ना, पेंच, कान्हा, सतपुड़ा एवं संजय टाइगर रिजर्व के लगभग 5 हजार वर्ग किलोमीटर के वफर जोन में प्रकृति को करीब से देखने का अवसर मिलता है। वनस्पति पर्यटन गतिविधियों के सुनियोजित और नियंत्रित विकास के उद्देश्य से मध्यप्रदेश वन (मनोरंजन एवं वन्यप्राणी अनुभव) नियम 2015 को बनाया गया है। इन प्रयासों से प्रदेश के जंगलों में अवैध कटाई, उत्खनन और चराई पर रोक लग रही है। बफर क्षेत्र के आस-पास रह रहे ग्रामीणों के जीवन स्तर को बढ़ाने के प्रयास भी इसी श्रृंखला में जुड़ गये हैं।

पर्यटकों को कोर क्षेत्र में बाघ दर्शन नहीं होने के कारण, बफर क्षेत्र में बाघ इन्टरप्रिटेशन क्षेत्र का निर्माण किया जा रहा है। इनके माध्यम से सुदूर क्षेत्रों से आये पर्यटक बाघ को अपने प्राकृतिक परिवेश में नजदीक से देख सकते हैं। युवाओं में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जागृत करने और उन्हें प्रकृति से जोड़ने के लिए कोशिशें जारी हैं जैसे- पक्षी दर्शन, प्रकृति पथ-गमन, वनस्पति ज्ञानवर्धन, साहसिक क्रीड़ाएँ और नौकायन आदि।

सतपुड़ा की लुभावनी घास

यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शाकाहारी वन्य प्राणियों के भोजन के लिए घास की 15 प्रकार की प्रजातियाँ हैं। अलग-अलग प्रकार की घास देखना भी पर्यटकों के लिए एक अनूठा अनुभव होता है। इन घासों के विचित्र से नाम हैं जैसे बड़ी चकौड़ा, छोटी भेंड़, गुरजू, डुरसी भाजी, बासिंग घास, छपकी छिप्पा, मुछैल घास, बडा चिप्पा, गोल चिप्पा, बड़ी भेंड़, भुरभुसी, भेंस कांही, ममेटी, गुंजी, बड़ी उरई, नागरमोथा, आमचारी डछारा, कंसकोरिया, गोगल आदि।

अभूतपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह देश की प्राचीनतम वन संपदा है जो बड़ी मेहनत से संजोकर रखी गई है। हिमालय के क्षेत्र में पाई जाने वाली वनस्पतियों की 26 प्रजातियाँ और नीलगिरी के वनों में पाई जाने वाली 42 प्रजातियाँ सतपुड़ा वन क्षेत्र में भी भरपूर पाई जाती है। इसलिए विशाल पश्चिमी घाट की तरह इसे उत्तरी घाट का नाम भी दिया गया है।

प्राचीनतम वन सम्पदा

कुछ प्रजातियाँ जैसे कीटभक्षी घटपर्णी, बांस, हिसालू, दारूहल्दी सतपुड़ा और हिमालय दोनों जगह मिलती हैं। इसी तरह पश्चिमी घाट और सतपुड़ा दोनों जगह जो प्रजातियाँ मिलती हैं उनमें लाल चंदन मुख्य है। सिनकोना का पौधा जिससे मलेरिया की दवा कुनैन बनती है यहाँ बड़े संकुल में मिलता है। संरक्षित क्षेत्रों के भीतरी प्रबंधन के मान से सतपुड़ा टाइगर रिजर्व अपने आप में देश का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। देश के बाघों की संख्या का 17 प्रतिशत और बाघ रहवास का 12 प्रतिशत क्षेत्र सतपुड़ा में ही आता है।

सतपुड़ा नेशनल पार्क एक प्रकार से हिमालय और पश्चिमी घाट के बीच वन्य-जीव की उपस्थिति का सेतु बनाता है। अपने आप में जैव-विविधता की विरासत है। यहाँ ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। यह देश का सर्वाधिक समृद्ध जैव-विविधता वाला क्षेत्र है।

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