ऐसी मजबूरीः 80 साल के बुजुर्ग को उठाना पड़ा हल, बेटे को बनना पड़ा बैल

ऐसी मजबूरीः 80 साल के बुजुर्ग को उठाना पड़ा हल, बेटे को बनना पड़ा बैल

By: Manish Gite

Published: 06 Jul 2018, 05:53 PM IST

भोपाल। एक तरफ देश की सरकार गरीब, किसानों और जरूरतमंदों के लिए तमाम प्रकार की योजनाएं चला रही हैं। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश से आई यह तस्वीर हैरान करती है। इस तस्वीर में एक 45 वर्षीय बेटा बैल की जगह पर खुद को लगाकर खेत जोतता दिखाई दे रहा है, जबकि उसके बुजुर्ग पिता को भी तपती दोपहरी में खेत जोतते देखा जा सकता है। कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा है कि यह तस्वीर हमारी सरकारों की विकास के दावों की पोल खोलती है।

मध्यप्रदेश के गुना जिले के 80 वर्षीय मेहताब सिंह और उनके 45 वर्षीय बेटे लक्ष्मीनारायण की यह कहानी है। यह इन दिनों शाजापुर में इसी तरह से खेती कर रहे हैं।

 

शाजापुर में लीज पर लिया खेत
गरीब बाप-बेटे को जब गुना में कोई रोजगार नहीं मिला तो गुजारा करने के लिए शाजापुर में एक खेत लीज पर ले लिया। आर्थिक रूप से कमजोर होने और संसाधनों से मोहताज होने के कारण दोनों को अपने ही दम पर खेत को जोतना पड़ रहा है।

इस प्रकार जोतते हैं खेत
बारिश से पहले ही बाप-बेटे ने खुद ही खेत जोतना शुरू कर दिया था। ये न ट्रैक्टर लेने का सोच सकते हैं और न बैलगाड़ी किराए पर लेने की हिम्मत कर सकते हैं। इसलिए बेटे ने बैल की जगह ले ली और पिता खेत को जोतते हुए अपनी जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं।

अब बीज बोने की तैयारी
बारिश से पहले दोनों ने मिलकर अपने खेत तो गुड़ाई कर बीज बोने की तैयारी कर ली है। रोज ही शाजापुर के इस खेत पर यह नजारा देखने को मिल जाता है। बैल की जगह बेटा और पीछे-पीछे पिता खेत जोतते हुए हर देखने वाले की निगाहें ठिठक जाती है।

 

कांग्रेस ने कहा यह है सरकार के दावे
मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने ट्वीट में इस तस्वीर को भी जारी कर कहा था कि किसान पुत्र के राज में खेती-किसानी को लेकर सरकार चाहे कितने भी बड़े दावे कर ले, लेकिन वास्तविक तस्वीर कुछ और है।

कमलनाथ ने अपने ट्वीट में यह भी लिखा है कि आज किसान सबसे ज़्यादा परेशान है...उनके नाम पर चल रही योजनाओं में जमकर भ्रष्टाचार है, जिसका उसे कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।

 

इससे पहले भी सामने आए ऐसे मामले
22 जून को ही देवास जिले के ग्राम पुरोनी में एक किसान परिवार को बैल की तरह हल में जुतना मजबूरी बन गया है। बाप-बेटे बैल की भूमिका निभा रहे हैं और मां पीछे से हल संभाल रही है। खेलने-कूदने और पढ़ाई छोड़ बच्चों को बच्चे हल के पिछले हिस्से में बैठकर संतुलन बनाना पड़ता है। आदिवासी किसान धूलसिंह की यह कहानी किसान कल्याणकारी तमाम योजनाओं के मुंह पर करारा तमाचा है।

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