यहां हर साल सबसे ज्यादा मासूम नहीं देख पाते दुनिया, इस वजह से जन्म लेते ही हो जाती है मौत

मध्य प्रदेश का नाम इस सूची में सबसे ऊपर आया तो प्रदेश की बागडोर संभाल रहे जिम्मेदारों और हर नागरिक को शर्म महसूस होगी।

By: rishi upadhyay

Published: 15 Jan 2018, 01:47 PM IST

भोपाल। पूरे देश में हर साल कई तरह की सूचियां जारी होती हैं, लेकिन एक सूची ऐसी भी है, जिसमें कोई भी राज्य अपना नाम देखना नहीं चाहता। इसके बावजूद मध्य प्रदेश का नाम इस सूची में सबसे ऊपर आया तो प्रदेश की बागडोर संभाल रहे जिम्मेदारों और हर नागरिक को शर्म महसूस होगी। हम बात कर रहे हैं रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (एसआरएस) द्वारा जारी रिपोर्ट की।

 

इस सूची के मुताबिक हर साल ढाई हजार करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद मप्र में प्रति एक हजार में से 47 नवजातों की मौत हो जाती है। नवजातों की मौत का यह आंकड़ा देश में सबसे ज्यादा है। हैरानी की बात यह है कि इस स्थिति के बावजूद प्रदेश का सरकारी महकमा इसे अपनी उपलब्धि मान रहा है। 2015 के सर्वे में यह दर प्रति एक हजार पर 50 थी, जो इस बार 3 अंक कम हो गई है। शनिवार को आयोजित एक कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग द्वारा यह रिपोर्ट पेश की गई।

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वर्ष ---------------------------------शिशु मृत्युदर
2007 ---------------------------------- 72
2008 ---------------------------------- 70
2009 ----------------------------------- 67
2010 ----------------------------------- 56
2011 ----------------------------------- 59
2012 ----------------------------------- 56
2013 ----------------------------------- 54
2014 ----------------------------------- 52
2015 ----------------------------------- 50
2016 ----------------------------------- 47

 

अंडर-5 मामले में दूसरे पायदान पर
एसआरएस की रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में जन्म के सात दिन और 28 दिन के भीतर मरने वाले बच्चों की तादाद भी देश में सर्वाधिक है। रिपोर्ट के अनुसार जन्म लेने वाले प्रति एक हजार बच्चों में 24 बच्चे ऐसे हैं, जिनकी सात दिन के अंदर मौत हो जाती है। वही, 32 बच्चे ऐसे हैं जो जन्म के एक माह के अंदर मौत के मुंह में समा जाते हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में प्रदेश दूसरे स्थान पर है।

 

केवल तीन अंकों का सुधार
प्रदेश में पिछले साल उच्च शिशु मृत्युदर का आंकड़ा 5० था, जो केवल तीन प्वॉइंट कम होकर इस साल 47 पर आ टिका है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी बदतर है। यहां प्रति हजार शिशुओं में 57 शिशुओं की मृत्यु हो जाती है। वहीं शहरों में यह आंकड़ा आंशिक सुधार के बाद 32 पर आया है।

 

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IMAGE CREDIT: foeticide

आखिर हम क्यों पिछड़े
तमाम योजनाओं के बावजूद प्रदेश में बच्चों की मौत हो रही है। बच्चों की हेल्थ और न्यूट्रिशन को लेकर काम कर रहे एक्टिविस्ट सचिन के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभागों में 60 फीसदी पद खाली पड़े हैं, पीने को साफ पानी नहीं है। न्यूट्रिशियंस डाइट नहीं है। ऐसे बहुत से कारण हैं, जिसने प्रदेश को आइएमआर की सूची में टॉप पर ला दिया है। इसके साथ ही ज्यादातर मौत का कारण चिकित्सकीय लापरवाही भी सामने आई है।

 

वहीं इस मामले में नेशनल हेल्थ मिशन के डायरेक्टर डॉ. बी.एन.चौहान का कहना है कि मप्र में शिशु मृत्युदर लगातार कम हो रही है। बीते साल की तुलना में इस बार तीन अंकों का सुधार हुआ है। इस साल 25 अंकों की गिरावट हो चुकी है। हमारा लक्ष्य इसे 30 से नीचे लाना है।

 

ये योजनाएं चलती हैं मप्र में
दस्तक अभियान, बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम, जननी सुरक्षा, प्रदेश के जिला अस्पतालों में एससीयू, मातृ शिशु स्वास्थ्य शिविर, महिला स्वास्थ्य शिविर आदि हैं।

 

 

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