शिवजी का पहला घर कैलाश पर्वत, दूसरा घर MP में, आप भी करें दर्शन

शिवजी का पहला घर कैलाश पर्वत, दूसरा घर MP में, आप भी करें दर्शन

भोलेनाथ का पहला घर कैलाश पर्वत है तो दूसरा घर जटाशंकरधाम है। यह स्थान पचमढ़ी की वादियों में सैकड़ों चट्टानों के बीच बसा हुआ है। यही के कण-कण में शिवजी बसते हैं। 


भोपाल। भोलेनाथ का पहला घर कैलाश पर्वत है तो दूसरा घर जटाशंकरधाम है। यह स्थान पचमढ़ी की वादियों में सैकड़ों चट्टानों के बीच बसा हुआ है। यही के कण-कण में शिवजी बसते हैं। पौराणिक कथाओं मे ंबताया गया है कि भस्मासुर जब शिवजी के पीछे पड़ गए थे तब शिवजी ने इटारसी के पास स्थित तिलक सिंदूर और उसके बाद पचमढ़ी के जटाशंकर में शरण ली थी। शिवजी ने यहां अपनी विशालकाय जटाएं फैलाई थी। यहां की चट्टानों के फैलाव को देखकर यही प्रतीत होता है। यह स्थान शिवजी का दूसरा घर माना जाता है।


पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब भस्मासुर शिवजी के पीछे पड़ गए थे उस समय शिवजी भागकर यही छुपे थे। पहाड़ों और चट्टानों के बीच बरगद के पेड़ों की झूलती शाखाएं देखकर ऐसा लगता है कि शिवजी ने अपनी विशालकाय जटाएं फैला रखी हैं। इसके साथ ही रॉक फॉर्मेशन से भी ऐसा ही प्रतीत होता है। बताया जाता है कि इसी कारण इस स्थान का नाम जटाशंकर पड़ा। इसके अलावा यहां बड़ी-बड़ी और झुकी हुई चट्टानों को देखकर भी ऐसा लगता है जैसे शिवजी अपनी जटाएं फैलाए हुए हैं। 


शिवजी का दूसरा घर है पचमढ़ी
MP के पचमढ़ी को कैलाश पर्वत के बाद महादेव का दूसरा घर माना जाता है। भगवान शिव भस्मासुर से बचने के लिए जिन कंदराओं और खोहों में छुपे थे वह सभी स्थान पचमढ़ी में ही हैं। महाशिवरात्रि के दौरान सैंकड़ों भक्त यहाँ पूजा करने के लिए आते हैं। यहां हर साल की तरह इस बार भी महाशिवरात्रि का मेला शुरू हो गया है।


(पचमढ़ी के जटाशंकर जाने वाले रास्ते कुदरती रूप से चट्टानों में विभिन्न आकृतियां बन गई हैं। इनमें शिवजी का एक नंदी शिवलिंग की तरफ मुख करके बैठा है, वहीं एक पहाड़ी की तलहटी पर गणेशजी नजर आते हैं।)

भजन गाकर फेमस हो गई यह भक्तन
यहां शिवजी के प्रति लोगों की इतनी श्रद्धा है कि वे लोगों के दिलों में बसते हैं। यहां एक महिला बरसों से शिवजी के भजन गाती है। उसके भजन और आवाज का जादू ऐसा है कि हर कोई श्रद्धालु उसके भजन सुनने के लिए ठहर जाता है। कुछ लोगों ने उसके भजनों की सीडी भी प्रकाशित की है। सिंधु बाई नाम की यह महिला दो दशक पहले महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के गोरज गांव से यहां आकर रहने लगी थी। वह क्यों आई इस बारे में वह सिर्फ इतना कहती है कि शिवजी ही मुझे यहां तक ले आए। सिंधु बाई को स्थानीय लोग भक्तन बाई के नाम से भी पुकारते हैं। पिछले दो दशकों से सिंधु बाई चट्टानों पर बैठकर भजन कीर्तन करती रहती है। पहाड़ों से निकालकर लाई गी जड़ी-बूटी बेचकर अपना पालन-पोषण करती है।

अब सिंधु बाई के भजनों की सीडी भी देश-विदेशों में अपनी पहचान बना चुकी है, जो भी पचमढ़ी आता है वह सिंधु बाई के बारे में जरूर पूछता है। सिंधु के भजन यू-ट्यूब पर भी मौजूद हैं। जब लोग जटाशंकर पहुंचते हैं और सिंधु बाई के बारे में पूछते हैं तो वह देखते-ही-देखते सबके सामने आ जाती है और शिव भक्तों के लिए भजन गाने लगती है। आज सिंधु बाई के मुख से यह भजन सुनकर सभी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और जोश और ऊर्जा से भर जाते हैं।

यह है भजन का भाव, सुनिए अम्मा की जुबानी
इस भजन में सिंधु बाई ने शिवजी की तारीफ की है और साथ में यह भी प्रार्थना की गई है कि आपके गले में सर्प की माला, भभूत लगाए, हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए शिवजी, तो कैसे पूजा करूं, मुझे डर लगता है।



जड़ी-बूटियां बेचकर पालती है पेट
चट्टानों में रहने वाली यह सिंधु बाई जडी-बूटियां बेचकर अपना पेट पालती है। वह बताती है कि पचमढ़ी के जंगलों में जड़ी-बूटियों का खजाना है। इसे जंगलों से लाते हैं और बेचते हैं। इन जड़ीबूटियों के सेवन से कई लोगों को बीमारियों में फायदा हुआ है।



(पचमढ़ीः शिवजी का एक अन्य स्थान भी है जिसे चौरागढ़ के नाम से जाना जाता है।)

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