महादेव का महात्म्य पाने उमड़ती भीड़

कलियासोत डैम स्थित मंदिर पर शिवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़, श्रावण में चारों तरफ जलराशि से घिर जाते हैं श्री विश्वनाथ महादेव...

By: Amit Mishra

Updated: 03 Mar 2019, 07:36 PM IST

भोपाल। कलियासोत डैम के नैसर्गिक सौंदर्य के बीच बना महादेव मंदिर अद्भुत माना जाता है। 30 वर्ष पूर्व बने इस मंदिर के बारे में कई रोचक तथ्य जानने योग्य हैं। महादेव मंदिर के महंत सुनील सिंह ने बताया कि कलियासोत डैम बनाने का ठेका दक्षिण भारत की एक कंपनी एसआरईसी को मिला था। ठेकेदार के लाख प्रयासों के बाद भी बांध का काम रफ्तार नहीं पकड़ रहा था। जहां आज मंदिर है, वहां विशाल टापू था। बांध बनाने का काम देख रहे रेड्डी बंधुओं ने इस टापू पर खुदाई करानी शुरू कराई तो वहां से नागों के गुच्छे निकले। खुदाई पर लगे मजदूर भी घबरा गए। ठेकेदार को भगवान शिव स्वप्न में दिखे और उन्होंने ठेकेदार से कहा कि जिस स्थान को तू खुदवा रहा है, वह स्थान मेरा है। वहां मंदिर बनाने के बाद ही काम सफल होगा।


मंदिर का नक्शा डिजायन किया...
भगवान शिव के सपने की बात ठेकेदार ने सुनील सिंह को बताई थी। बांध निर्माण के समय उनका भी अधिकांश समय वहीं बीतता था। सुनील सिंह का कहना है कि ठेकेदार ने इंजीनियर्स के साथ मिलकर मंदिर का नक्शा डिजायन किया और जैसे ही निर्माण शुरू किया, सिंचाई विभाग के लोगों ने आपत्ति करते हुए रुकवा दिया। मंदिर निर्माण रुकने के बाद बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं व स्थानीय लोगों के साथ प्रदर्शन किया।

 

मंदिर निर्माण बाद सिंचाई विभाग के अधिकारी कुछ ढीले पड़े और उनके परोक्ष इशारे पर अष्टकोणीय मंदिर का निर्माण वर्ष 1986 में पूर्ण किया गया। मंदिर की डिजायन भी कंपनी के मुखिया रेड्डी ने की थी। रेड्डी का कहना था कि एनर्जी 10 दिशाओं से आती है। आकाश और पाताल को छोड़कर मंदिर की बाकी आठ भुजाएं वास्तु के हिसाब से डिजायन की गईं। इस मंदिर पर श्रावण मास, शिवरात्रि, नवदुर्गा व सोमवार को भीड़ होती है। प्रेमी युगल भी महादेव से अपनी कामना पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं।


भूमिगत पानी का तीव्र प्रवाह है यहां...
पूर्व में पुणे के एक वास्तुविद् मंदिर दर्शन को आए थे। शिवलिंग के पास बैठे-बैठे उन्हें अचानक झटका लगा था। उन्होंने अपने कर्मचारियों से गाड़ी में रखे यंत्रों को मंगाया और जांच करने के बाद बताया कि शिवलिंग पिंडी के नीचे नैऋत्य से ईशान कोण की तरफ भूमिगत पानी का तीव्र प्रवाह है। वैसे भी वास्तु के अनुसार नैऋत्य कोण में पहाड़ (ऊंचा) और ईशान कोण में जलप्रवाह (नीचा) होना चाहिए।

 

चलता रहता है पूजन और अभिषेक...
इस मंदिर में भूमिगत पानी के चट्टानों से घर्षण के कारण जबर्दस्त ऊर्जा उत्सर्जित हो रही है और पिंडी के आसपास ऊर्जा प्रवाह निकल रहा है। यह पॉजिटिव एनर्जी का फ्लो है। मिश्र के पिरामिड की तर्ज पर मंदिर के गुंबद से भी ऊर्जा आ रही है, जो वहां बैठे लोग अर्जित करते हैं। यहां बारहों मास नियमित अभिषेक-पूजन करता हूं। जब पानी ऊपर आ जाता है तो रास्ता बंद हो जाता है। मंदिर के महंत और श्रद्धालुओं ने यहां काले सर्पों के अलावा दुर्लभ प्रजाति के कछुए, घडिय़ाल, मगरमच्छ और गोह को भी मंदिर के बाहर बैठे देखा है।

 

महंत का कहना है कि 2013 में मंदिर को आने वाले एकमात्र रास्ते पर जब 10 फीट से ज्यादा पानी था तो आना मुश्किल था। बरसात में नाव से मंदिर जाता हूं। यहां नीम, सप्तवर्णी, आंवला, शीशम, जामुन, शरीफा, बेर, मदार, धतूरा, आम, पीपल, बेल, शमी, चंदन, तुलसी आदि पेड़-पौधे लगाए गए हैं। यहां डैम में दुर्लभ घडिय़ाल, मगरम'छ, कई प्रजातियों के कछुए हैं। ये पौधे महंत, सीपीए और अन्य श्रद्धालुओं ने लगाए हैं।



प्रकृति व जीवप्रेमी महामानव दिग्विजय सिंह भदौरिया स्मृति में समाजसेवी पं. शेखर दुबे, हरनाथ सिंह चौहान, शिवेन्द्र सिंह चौहान, डॉ. अनीता भदौरिया, एमएल यादव, डॉ. एचपी शर्मा, अनिरुद्ध, संजय हिन्ना, शशांक, सुनील साहू समेत कई लोग हर साल 28 जुलाई को यहां पौधे लगाते हैं और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं। समाजसेवी हरनाथ सिंह चौहान व दिनेश सिंह भदौरिया ने यहां एक हनुमान मंदिर का निर्माण संकल्प लिया था, जिसका निर्माण शुरू हो गया है। पर्यटन विकास निगम ने यहां काफी विकास कार्य कराए हैं। यहां सड़क और बिजली के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ और सुविधाएं हो जाएं तो यह स्थान पर्यटन की अनूठी छवि पा सकता है।

Amit Mishra
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