मानव संग्रहालय में विभिन्न राज्यों के कलाकारों ने बनाए चित्र.. देखें

मानव संग्रहालय में विभिन्न राज्यों के कलाकारों ने बनाए चित्र.. देखें

hitesh sharma | Publish: Mar, 14 2018 09:02:00 AM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

यह 'कांगड़ा शैली पहाड़ी चित्रकला के तीसरे चरण का प्रतिनिधित्व करती है।

भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित रुक्मिणी प्रसंग में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र से आए पारंपरिक कलाकार दीपक भंडारी, राजीव कुमार, सुशील कुमार ने 'कांगड़ा शैली' पर रुक्मिणी हरण, रुक्मिणी-कृष्ण विवाह और रुक्मिणी द्वारा गौरी पूजन हेतु मंदिर जाने के दृश्यों का चित्रण किया है। रुक्मिणी हरण प्रसंग पर कृष्ण ? और रुक्मिणी के मध्य युद्ध को दर्शाया गया है।

चित्र का मु य विषय श्रृंगार और प्रकृति है। भक्ति सूत्र इसकी मु य शक्ति है और रुक्मिणी-कृष्ण की प्रेम कथा इसका मु य आधार है। यह शैली प्रकृतिवादी है और इसमें बहुत ध्यान से छोटी-छोटी चीजें विस्तार में बनाई गई हैं। इस चित्र में फूल, पौधे, लता, नदी, बिना पत्तों के पेड़ आदि हैं।

कांगड़ा में दिखता है प्रकृतिवाद

'कांगड़ा शैली पहाड़ी चित्रकला के तीसरे चरण का प्रतिनिधित्व करती है। इस शैली का विकास गुलेर शैली से हुआ, इसमें आरेखण में कोमलता और प्रकृतिवाद की गुणवत्ता जैसी प्रमुख विशेषताएं होती हैं। चित्रकला के इस समूह को कांगड़ा शैली का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ये कांगड़ा के राजा संसार चन्द की प्रतिकृति की शैली के समान है।

इन चित्रकलाओं में पाश्र्विका में महिलाओं के चेहरों पर नाक लगभग माथे की सीध में हैं, नेत्र ल बे तथा तिरछे हैं और ठुड्डी नुकीली है। कलाकार प्राकृतिक एवं ताजे रंगों का प्रयोग करते हैं। ये रंग खनिज व वनस्पति से बनते हैं।

मीठा सरसों के तेल को जलाकर उससे निकले धुंऐ से काजल का काला रंग बनाते हैं, खडिय़ा पत्थर से सफेद रंग, नील के पत्थर से नीला रंग, पेवडी पत्थर से पीला रंग, गोलुआ पत्थर गेरुआ रंग, संगरफ पत्थर से लाल रंग और सोने के पाउडर से सोने का रंग बनाते हैं। इसमें रुक्मणी का आकर्षण बहुत ही सुंदर ढंग से दिखाया गया है उनके चेहरे कोमल, सुंदर तथा देहयष्टि सुगठित है, तथा विस्तार से प्राकृतिक दृश्य दिखाए गए हैं।

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