अंग्रेजों को छकाकर क्रांतिकारी ने कोर्ट में बताई बम बनाने की विधि

अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद जयंती अवसर पर आजाद कथा चित्र प्रदर्शनी का आयोजन

 

By: दीपेश तिवारी

Published: 24 Jul 2018, 11:34 AM IST

भोपाल@हितेश शर्मा की रिपोर्ट...

स्वराज संस्थान संचालनालय द्वारा अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जयंती अवसर पर 23 जुलाई को स्वराज वीथी में चन्द्रशेखर आजाद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित चित्र प्रदर्शनी आजाद कथा का आयोजन किया जा रहा है।

सोमवार से शुरू इस एग्जीबिशन में देश की आजादी के लिए किए गए संघर्ष, साइमन कमीशन के विरोध में साण्डर्स वध, ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए काले कानून के विरोध में बम विस्फोट और अनेक क्रांतिकारी आंदोलन की घटनाओं और उनके जीवन कृतित्व को दर्शाते 40 से अधिक चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

इन्हें चित्रकार लक्ष्मण भांड ने बनाया है, वहीं रंजना चितले ने इस पर आजादी का इतिहास उकेरा है। प्रदर्शनी 27 जुलाई तक प्रतिदिन दोपहर 12 से शाम 7 बजे तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

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फोटो में दिखाया असेम्बली कांड का दृश्य

असेम्बली बम कांड की सुनवाई के समय अदालत में क्रांतिकारी आंदोलन के उद्देश्य तथा कार्य स्पष्ट हो चुके थे। जनता क्रांतिकारियों के विचार जान चुकी थी। जिससे युवाओं में चेतना जागी और अंग्रेजों का आतंक टूटने लगा। ऐसे समय में आजाद चाहते थे कि क्रांति की सोच के साथ क्रांति के हथियार भी जनता तक पहुंचाए जाए, लेकिन ये इतना आसान नहीं था।

लाहौर षडयंत्र मुकदमे के समय मुखबिर फणीन्द्र घोष बयान देने कोर्ट पहुंचे। यहां क्रांतिकारी शिव वर्मा ने अदालत में बम बनाने की विधि बता दी। ये विधि समाचार पत्रों के माध्यम से जनता तक पहुंची।

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काकोरी कांड के बाद मिली फांसी की सजा

क्रांतिकारियों को अपने कार्यों के लिए पैसों की आवश्यकता पड़ती थी लेकिन गुप्त आंदोलन होने से क्रांतिकारी सार्वजनिक रूप से चंदा नहीं मांग सकते थे। धनी व्यक्तियों और व्यावसायिक संघटनों से बलपूर्वक धन लेना पड़ता था।

9 अगस्त 1935 को दस क्रांतिकारियों ने लखनऊ के निकट काकारो नामक स्थान पर सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर रोककर सरकारी खजाना लूट लिया। इस अभियान में चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मनाथ गुप्त, मुकंदौलाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारीलाल शामिल थे।

घटना के पुलिस चौकन्नी हो गई। बिस्मिल, अशफाक, रोशनसिंह, लाहिड़ी को फांसी हो गई और शेष को कालापानी की सजा।

 

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पहचान छिपाकर की साथियों की मदद

आजाद का अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ सदा संपर्क रहा। वे उनकी सहायता व रक्षा के लिए सदा तैयार रहते थे। काकोरी कांड के मुकदमे के सिलसिले में जब अशफाक उल्ला खां के भाई रियासत अल्ला खां लखनऊ जेल में मिलने गए तो आजाद जान गए कि मुकदमे के लिए पैसों की जरूरत है।

वे रात के अंधेरे में अशफाक उल्ला के घर जा पहुंचे और बोले अशफाक ने आपकों रूपया भेजा है। पहचान पूछने पर बोले कि पहले दिया सलाई ले आइए, जब तक दिला सलाई आई वे वहां से जा चुके थे।

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दीपेश तिवारी
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