ट्रेंड से हटकर था 2018 का विधानसभा चुनाव, इस बार कोरोना बिगाड़ेगा भाजपा-कांग्रेस के वोट का गणित

2018 का चुनाव ऐसा था, जब 15 साल की भाजपा सरकार गिरी, लेकिन सरकार बनाने वाली कांग्रेस वोट के मामले में पीछे रही।

By: Pawan Tiwari

Updated: 25 Sep 2020, 08:27 AM IST

भोपाल. प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हार-जीत वोट प्रतिशत पर टिकी रहती है। तीन दशक यानी नौ विधानसभा चुनाव देखें तो जब-जब ज्यादा वोटिंग हुई तब-तब सत्ता परिवर्तन भी हुआ। 2003 में उमा भारती ने 10 साल की दिग्विजय सरकार पलटी, तब भाजपा को 10.89 फीसदी वोट ज्यादा मिले थे।

ट्रेंड से हटकर 2018 का चुनाव ऐसा था, जब 15 साल की भाजपा सरकार गिरी, लेकिन सरकार बनाने वाली कांग्रेस वोट के मामले में पीछे रही। भाजपा को 0.13 प्रतिशत वोट ज्यादा मिले, पर सीटें कांग्रेस की ज्यादा थीं। हालांकि, यह अंतर ज्यादा नहीं था। इसी का नतीजा रहा कि 22 विधायकों की बगावत के कारण कांग्रेस सरकार गिर गई। अब सत्ता में भाजपा है, जिसके सामने 28 उपचुनाव में जीत की चुनौती है। भाजपा के लिए यह सरकार बचाने का चुनाव है, तो कांग्रेस के लिए वापस सरकार बनाने के मौका।

कौन किसके साथ
वोटिंग ट्रेंड देखें तो शहरी वोटर भाजपा के पक्ष में अधिक रहते हैं। वहीं, ग्रामीण व पिछड़े इलाकों ने ज्यादातर कांग्रेस का साथ दिया है। इस बार कारण परिस्थितियां बदली हुई हैं। वोटर को घर से निकालकर बूथ तक लाना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

ग्रामीणों को जोडऩा है
भाजपा में दो मोर्चों पर एक साथ काम हो रहा है। उपचुनाव वाली सीटों पर शहरी इलाकों में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाना और वोटरों से ज्यादा से ज्यादा कनेक्ट होना। दूसरा ग्रामीण, आदिवासी व पिछड़े इलाकों में पार्टी के आधार को बढ़ाना। नए वोटरों पर ज्यादा फोकस है। ग्वालियर-चंबल इलाके पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि यहां 16 सीट हैं।


पिछड़ों पर ज्यादा जोर
कांग्रेस उपचुनाव में अपने परंपरागत वोट बैंक को अधिक फोकस कर रही है। इसके तहत ग्रामीण, आदिवासी, पिछड़े व स्लम इलाकों में अधिक जोर दिया जा रहा है। यह तबका कोरोना की उतनी परवाह नहीं करता। उस पर इन इलाकों में पार्टी का अच्छा वोट बैंक है। ग्वालियर-चंबल इलाका पार्टी के लिए शहरी व ग्रामीण स्तर पर प्राथमिकता में हैं।

चुनौतियां कम नहीं
सत्तारुढ भाजपा के लिए अपने वोट बैंक को समझाना और नए वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षिक करके शहरी व प्रबुद्धजन वाले इलाकों में बाहर लाना बड़ी चुनौती है। वहीं, ग्रामीण, आदिवासी और पिछड़े इलाकों में अभी कोरोना संक्रमण का कहर शहरी इलाकों की तुलना में कम है, इस कारण वहां ज्यादा वोटिंग हो सकती है। इन सभी पहलुओं का भी दोनों दल आकलन कर रहे हैं।

ये भी अहम
1985 में भाजपा को ढहाकर कांग्रेस ने सत्ता पाई, तब 16.42 फीसदी वोट ज्यादा लिए थे। फिर 1990 में भाजपा ने 5.76 फीसदी वोट ज्यादा लेकर सत्ता वापस ली। 1993 में फिर सत्ता बदल गई, लेकिन कांग्रेस को भाजपा से महज 1.85 फीसदी वोट ज्यादा मिले। इसके बाद 1998 में 1.31 फीसदी वोट ज्यादा लाकर दिग्विजय सरकार बरकरार रही, लेकिन 2003 में भाजपा ने 10.89 फीसदी वोट ज्यादा लेकर जो सत्ता पाई तो फिर कांग्रेस सत्ता से 2018 तक दूर ही रही।

वोटिंग प्रतिशत

2018 में भाजपा को 109 सीटें मिलीं। 41.12 फीसदी वोट प्रतिशत रहा। जबकि कांग्रेस को 114 सीटें मिलीं और उसे 40.89 फीसदी वोट मिला। इस चुनाव में भाजपा का कांग्रेस से 0.13 फीसदी वोट ज्यादा मिले। 2013 में भाजपा को 165 सीटें मिली। वोट प्रतिशत 44.88 था जबकि कांग्रेस को 71 सीटें मिलीं। 36.38 वोट प्रतिशत रहा। इस बार भाजपा को 8.5 फीसदी वोट ज्यादा मिले। 2008 में भाजपा को 143 सीटें मिलीं। 37.64 फीसदी वोट मिले। कांग्रेस को 71 सीटें मिलीं। वोट प्रतिशत 32.39 फीसदी रहा। भाजपा को 5.25 फीसदी ज्यादा वोट मिले।

Pawan Tiwari
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