बाहरियों को बनाया उम्मीदवार , स्थानीय करते रहे इंतजार

बाहरियों को बनाया उम्मीदवार , स्थानीय करते रहे इंतजार

Harish Divekar | Publish: Oct, 27 2018 12:08:20 AM (IST) | Updated: Oct, 27 2018 12:08:21 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

भाजपा और कांग्रेस ने की कई बार स्थानीय नेताओं की उपेक्षा

सूबे के सियासत में भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने कई बार स्थानीय नेताओं की उपेक्षा करते हुए बाहरी उम्मदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है।

इसके पीछे कई बार नेताओं के अपने गुणा-भाग रहे तो कई बार राजनीतिक दलोंं ने जीत के समीकरणों को देखते हुए बाहरी उम्मदवारों को भेजा।

स्थानीय नेताओं का जीवन संगठन के लिए काम करने में ही खप जाता है और टिकट की बारी आने पर किसी बाहरी दिग्गज को मैदान में उतार दिया जाता है।

भाजपा में इस बार के चुनाव में कई सीटों पर बाहरी उम्मीदवारों का विरोध शुरू हो गया है।

पिछले दस दिनों से प्रदेश कार्यालय पर जारी प्रदर्शन और नारेबाजी के दौरान कई क्षेत्रों के कार्यकर्ता बाहरी प्रत्याशी को हटाकर किसी स्थानीय नेता को टिकट देने की मांग करने पहुंचे हैं।

 

दो दिन पहले बैरसिया क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं ने विष्णु खत्री को बाहरी बताते हुए स्थानीय प्रत्याशी को टिकट देने की मांग की तो वहीं शुक्रवार को बदनावर के कार्यकर्ताओं मोर्चा खोल दिया।

कांग्रेस में भी इस बार बाहरी प्रत्याशियों का विरोध तेज है। राजधानी में हुई स्क्रिनिंग कमेटी की बैठकों में कई दावेदारों ने मधुसुदन मिस्त्री के सामने बाहरी नेताओं को मौका ना देने का मुद्दा उठा चुके हैं।

कांग्रेस-
मुकेश नायक- दमोह छोड़ कर पिछली बार पन्ना जिले की पवई सीट से विधायक बने।

रामकृष्ण दोगने- हरदा से विधायक, इन पर बाहरी का ठप्पा है। अब स्थानीय नेता कर रहे टिकट की मांग।
राजेंद्र मंडलोई- भोपाल निवासी, पिछला चुनाव हजूर सीट से लड़े। अब कालापीपल से टिकट की मांग कर रहे हैं।

 

 

महेंद्र सिंह कालूखेड़ा- रतलाम जिल के जावरा के निवासी थे, वहीं से पहले विधायक रहे। लेकिन २०१३ में चार सौ किलोमीटर दूर अशोकनगर जाकर चुनाव लड़े, विधायक बने। कालूखेड़ा का पिछले दिनों निधन हो चुका है।

भाजपा-
कैलाश विजयवर्गीय- पहले इंदौर-4 से चुनाव लड़ा, बाद में इंदौर-2 सीट पर पहुंचे और पिछले दो चुनाव महू से लड़कर विधायक बने।

नरोत्तम मिश्रा- डबरा से विधायक का चुनाव लड़ते थे। परिसीमन में सीट आरक्षित हुई तो जिला बदल कर दतिया पहुंच गए।
रामकृष्ण कुसमरिया- पथरिया से चुनाव लड़ते थे। २०१३ में हार के डर से राजनगर पहुंचे, वहां भी हारे तो अब पथरिया या पवई दाव आजमा रहे हैं।

भंवर सिंह शेखावत- इंदौर के निवासी, २०१३ में धार जिले की बदनावर सीट से विधायक बने। अब स्थानीय स्तर पर बाहरी होने का विरोध।
दीपक जोशी- बागली के निवासी, सीट परिसीमन में आरक्षित हुई तो हाटपिपलिया पहुंचे, अब खातेगांव पर नजर।

 

दिव्यराज सिंह- रीवा के निवासी, लेकिन चुनाव सिरमौर से लड़कर विधायक बने।
रामपाल सिंह - पहले उदयपुरा से चुनाव लड़ते थे, २०१३ में सिलवानी से विधायक बने।

अनूप मिश्रा- पहले ग्वालियर पूर्व से विधायक बने। २०१३ में भितरवार जा पहुंचे, वहां विधानसभा चुनाव हारे तो २०१४ में जिला बदलकर मुरैना से चुनाव लड़कर सांसद बन गए।

वर्जन-

कार्यकर्ता प्रदेश कार्यालय पहुंच कर टिकट की मांग करते हैं तो यह उनकी भावना है। स्थानीय लोगों को ही संगठन टिकट में वरीयता प्रदान करता है। इसबार भी इस आधार पर टिकट दिए जाएंगे।
राकेश सिंह, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा मध्यप्रदेश

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