अगले तीन साल में ढाई गुना रेत बेचकर खजाना भरेगी कमलनाथ सरकार

अब तक डेढ़ करोड़ घन मीटर रेत निकाली जाती थी, तीन साल में चार करोड़ घनमीटर रेत बेचेगी सरकार

भोपाल. खाली खजाना भरने के लिए सरकार की नजर प्रदेश के खनिज संसाधनों पर है। अगले तीन सालों सरकार लगभग चार करोड़ घन मीटर रेत नदियों से निकाल कर बेचेगी, जबकि इसके पहले तीन साल मे डेढ़ करोड़ घन मीटर रेत नीलाम की जाती थी।

खनिज विभाग ने सीएम सचिवालय में प्रदेश की 1450 खदानों की नीलामी करने का प्रस्ताव दो दिन पहले ही भेजा है। नीलामी और टेंडर नियम तैयार कर लिए गए हैं। खदानों की नीलामी 2022 तक के लिए जारी की जाएगी। मध्यप्रदेश माइनिंग कॉरपोरेशन के कार्यपालक संचालक दिलीप कुमार का कहना है कि जिला स्तर पर क्लस्टर बनाने का प्रस्ताव शासन के पास भेजा है। सरकार की स्वीकृति मिलने के बाद साढ़े 14 सौ खदानों के टेंडर जारी किए जाएंगे।

भोपाल-इंदौर में रेत की उपलब्ध नहीं

नई नीति के अनुसार रेत की नीलामी जिला स्तर पर की जाएगी। भोपाल और इंदौर सहित 8 जिलों में रेत की उपलब्धता नहीं है। रेत की टीपी ऑनलाइन के साथ ही मैन्युअल भी जारी की जाएगी। टीपी में रेत बिक्री मात्रा से लेकर ट्रक नम्बर, रेत कहां जा रही है, खरीददार के नाम भी उल्लेख किया जाएगा।

अवैध उत्खनन रोकने बनाया क्लस्टर

खनिज विभाग ने रेत के अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन रोकने के लिए जिला स्तर पर क्लस्टर बनाने बनाने का प्रस्ताव तैयार किया है। जिले की सभी खदानें एक ही ठेकेदार के पास होने से ठेकेदार खुद रेत चोरी रोकने का प्रयास करेगा। बिना ठेकेदार की सहमति के कोई भी रेत नदी से नहीं निकाल पाएगा। अगर कोई चोरी छिपे निकालने की कोशिश भी करता है तो वह इसकी सूचना पुलिस को देगा।

50 लाख से 100 करोड़ में ठेका

खनिज विभाग ने होशंगाबाद और जबलपुर जैसे बड़े रेत खदान क्लस्टरों की न्यूनतम कीमत सौ करोड़ रुपए आंकी है। वहीं कई जिलों के क्लस्टरों की 30 लाख से 50 लाख रुपए प्रारंभिक कीमत तय की गई है। सबसे ज्यादा रेत नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में है। जिन नदियों में रेत की मात्रा कम हैं और उसे नीलाम नहीं किया जा रहा है, उस रेत पर अधिकार खनिज विभाग का रहेगा।

पंचायतों से वापस होंगी खदानें

सरकार पंचायतों से 300 रेत खदानें वापस लेगी। यह खदानें जून तक ठेकेदारों को आवंटित की जाएगी। माइनिंग प्लान और पर्यावरण स्वीकृति भी ठेकेदारों को ट्रांसफर की जाएंगी। इसके अलावा पूर्व में जिन्हें रेत खदाने आवंटित की गईं थी, उनसे भी खदानें वापस ली जाएंगी। रेत खदानों पर कैमरे लगाने की जिम्मेदारी ठेकेदारों की होगी। 24 घंटे मानीटरिंग करना होगी। इसका एक सर्वर खनिज विभाग के पास होगा। इससे वह अवैध उत्खनन और परिवहन पर नजर रख सके।

ढाई गुना रेत उत्खनन ठीक नहीं

पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पाण्डे का कहना है यह निर्णय बहुत दुखद है। वैसे भी रेत ठेकेदार निर्धारित मात्रा से दोगुनी रेत नदियों से निकालते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाइए कि नदियों का क्या हाल होगा। डॉ. पांडे का कहना है कि ज्यादा रेत निकालने से उसके कारण नदियों की भौतिक स्थिति और जैव विविधता चरमरा जाती है। रेत में पानी को भंडारित करने की क्षमता कम हो रही है। ज्यादा रेत उत्खनन का ही असर है कि हमारे प्रदेश की नदियां गर्मियों में जल्दी सूख रही हैं और बारिश में उनमें जल्दी बाढ़ आ रही है। ज्यादा रेत निकालने से नदियों के तट पर वृक्षारोपण भी प्रभावित होगा।

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रविकांत दीक्षित
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