नेहरू की शादी हमारी हवेली पर हुई

नेहरू की शादी हमारी हवेली पर हुई

hitesh sharma | Publish: Sep, 04 2018 04:00:52 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

शायर गुलजार देहलवी ने कहा आज के शायरों को खुद तहजीब, अदब और कायदा सीखना होगा

भोपाल। शायरी का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों को भी शेर-शायरियों से प्रेरणा मिलती थी। आज के शायर मंच पर शायरी करने नहीं ड्रामा करने आते हैं। वे मंच पर अदाकारी करते हुए फुहड़ शेर पढ़ते हैं। कोई इतना मेकअप करके आता है कि जैसे शायरी नहीं एक्टिंग करने आया हो। इन शायरों ने मुशायरे को बदनाम कर रखा है। मैं कई बार मंच पर इस तरह की हरकतों का विरोध कर चुका हूं। ये बात मशहूर शायर गुलजार देहलवी ने पत्रिका प्लस से बात करते हुए कही। वे रवीन्द्र भवन में आयोजित अखिल भारतीय मुशायरा में शामिल होने आए हुए थे।

उन्होंने कहा देश में फैज, शैरी भोपाली, आलम फतेहपुरी, अली सरदार, फिराग जैसे शायर हुए। जब वे शेर और शायरी पढ़ते थे तो लोग न सिर्फ उन्हें सुनने बल्कि नफासत सीखने आया करते थे। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि बीच मुशायरा में हिल-ढुल भी सके। उन शायरियों में एक संदेश छिपा होता है। जो प्यार, मोहब्बत, जज्बातों की बात तो करता ही था, साथ ही समाज की चिंता के साथ राजनीति पर कटाक्ष करने से भी पीछे नहीं हटता था। अब शायरी भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध न होकर साथ खड़ी दिखती है। इस मुकाम को पाने में 250 वर्षों की मेहनत इसे छिपी हुई है।

स्तर को बनाए रखना एक चुनौती
मुशायरा में दर्शकों की घटती दिलचस्पी और एक वर्ग तक सिमटने का कारण बताते हुए वे कहते हैं कि आज के शायर मेहनत नहीं करना चाहते। या तो वे चोरी की शायरी सुनाते हैं या जोड़-तोड़ की। मंच पर आने के लिए खुद को तपाना होगा। जब तक खुद के अंदर आग नहीं जलेगी, मंच को लुटना का ख्वाब एक ख्वाब ही रहेगा। हालांकि आज भी घटिया मुशायरा के बीच अच्छी गजल-शायरियों को खूब दाद मिलती है। उर्दू ने हिन्दी-पंजाबी को भी जान देने का काम किया है।

मुझे देख मोतीलाल नेहरू रथ से उतर आए
हमारे मुल्क में जवाहर लाल नेहरू की सवारी चल के आई हैं, हमारे मुल्क में बादे-ए- बहरी चल के आई हैं... जैसे ही मैंने जवाहर लाल नेहरू की बारात में अपनी यह शायरी पढऩी शुरू की, पूरी बारात में जो हुजूम था, वो नाच पड़ा। वे कहते हैं कि नेहरू की शादी हमारी हवेली मोहल्ला कश्मीरीयाना, कूचा पतीराना में हुई थी, तब मेरी उम्र 10 साल थी। बारात जब हौज काजी से चली तो मोतीलाल नेहरू रथ से उतार गए, मेरे पिताजी ने कहा कि कुछ शेर-शायरी कहो, तो मैंने शायरी पढ़ी। जिससे सुनकर नेहरू ने मेरी बहुत तारीफ की। गुलजार देहलवी को जाकिर हुसैन ने डाक्टरेट की उपाधि से नवाजा था, इसी के साथ जामिया की 25वीं और 50वीं वर्षगांठ पर गुलजार ने ही पहले नज्म पढ़ कार्यक्रम की शुरूआत की और आज भी उनकी नज्म जामिया की दीवारों पर लिखी है। मेरा पहला स्वागत नेहरू के आवास त्रिमूर्ति में हुआ।

विश्व के 64 देशों में मिला सम्मान
मौलाना आजाद के घर में सात बजे के बाद सिर्फ सात लोगों की इंट्री हुआ करती थी, जिसमें मैं भी शामिल था, वहां सात बजे के बाद हमारे जाम टकराते थे, वहीं उस वक्त देश के सभी कद्दावर नेता को मैंने जहां बुलाया, वे वहां पहुंच जाते थे। नेहरू जी का मेरे प्रति अति स्नेह था, मेरे बिना राजीव गांधी के समय तक कांग्रेस का कोई जलसा नहीं होता था। मुझे विश्व में 64 देशों से सम्मान मिला। मां के कहने पर 1943 में पहली बार आशिकाना शायरी लिखी थी, क्योंकि मेरी मां का कहना था कि तुम्हारे वालिद दाग के पहले शागिर्द हैं। वे इश्क और सूफियाना शायरी करते हैं और तुम कौमी और इंकलाबी शायरी करते हो।

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