भारतीय राजनीति के अजातशत्रु से जुड़ा एक किस्सा, जो आज तक नहीं भूल पाया ये शहर

भारतीय राजनीति के अजातशत्रु से जुड़ा एक किस्सा, जो आज तक नहीं भूल पाया ये शहर

Deepesh Tiwari | Publish: Apr, 16 2019 11:05:00 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

अटल की राजनीति का एक अनछुआ पहलु...

भोपाल। भारतीय राजनीति के अजातशत्रु के नाम से प्रसिद्ध अटल बिहारी वाजपेयी यदि आल जीवित होते तो 94 साल के हो गए होते। हालांकि वे अब नहीं हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी भारतीय राजनीति में हमेशा रहेगी,16 अगस्त, 2018 को वाजपेयी का निधन हो गया था।

बतौर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी हर मुमकिन ऊंचाई तक पहुंचे, वे प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले ग़ैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे।

वाजपेयी 1942 में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई 23 दिनों के लिए जेल गए। 1951 में आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन हुआ तो श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं के साथ अटलबिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका रही।

चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी...
पूर्व प्रधानमंत्री और 'भारत रत्न' अटल बिहारी वाजपेयी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता थे, जो चार राज्यों के छह लोकसभा lok sabha election क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके थे।

उत्तर प्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्यप्रदेश के ग्वालियर और विदिशा और दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी इकलौते नेता हैं।

अटल जी का पीएम पद तक पहुंचना कोई आसान काम भी नहीं था, कभी महज़ दो सीटों वाली पार्टी रही भारतीय जनता पार्टी BJP के नेतृत्व में सरकार बनाने की उपलब्धि केवल अटल बिहारी वाजपेयी की भारतीय राजनीति में सहज स्वीकार्यता के बूते की बात थी, जिसे भांपते हुए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को भी लालकृष्ण आडवाणी Adwani को पीछे रखकर वाजपेयी को आगे बढ़ाना पड़ा था।

अपने पूरे राजनैतिक काल में राजनीति के अजातशत्रु से जुड़ा एक ऐसा पन्ना भी है, जिसे शायद न तो वे ही कभी भुला पाए और न ही वो मथुरा के लोग जिनके कारण ये अध्याय लिखा गया।

भले वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे। जिसमें पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने तक और उसके बाद 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया। इस दौरान उन्होंने ये साबित किया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलता से चलाया जा सकता है।

जमानत तक गई...
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता की भी एक बार चुनाव में जमानत जब्त हो गई थी। यह सब सुनने में अजूबा लगता है, लेकिन ऐसा हो चुका है।

दरअसल, बात 1957 में देश के दूसरे लोकसभा चुनाव की है, जब जनसंघ के नेता अटल जी ने एक साथ उत्तर प्रदेश की तीन सीटों पर किस्मत आजमाई थी। यह उनका पहला चुनाव था। उन्होंने बलरामपुर, लखनऊ और मथुरा से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल किया था।

इस चुनाव में वाजपेयी बलरामपुर से तो चुनाव जीत गए, लेकिन लखनऊ में हार का मुंह देखना पड़ा। वहीं मथुरा में तो वाजपेयी जी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए।

 

 

 

लेकिन मथुरा में हुए इस चुनाव के संबंध में कई और खास बातें भी हैं, कहा जाता है कि वाजपेयी यह चुनाव जान-बूझकर हारे थे। इतना ही नहीं अटलजी ने अपने विरोधी उम्मीदवार मुरसान रियासत के राजा महेन्द्र‍ प्रताप सिंह के लिए वोट भी मांगे थे। महेन्द्र प्रताप क्रांतिकारी थे और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया था।

 

 

चौथे नंबर पर आए: फिर भी बने सांसद!...
मथुरा में एक सभा के दौरान अटलजी ने कहा था कि मथुरा वालों जैसा प्यार आप मुझे दे रहे हो, ठीक वैसा ही प्यार मुझे बलरामपुर में भी मिल रहा है। ईश्वर ने चाहा तो मैं बलरामपुर से जीता जाऊंगा, लेकिन मैं चाहता हूं कि मथुरा से आप राजा महेन्द्र प्रताप को जिताओ।

इसके बाद चुनाव परिणाम आने पर वाजपेयी बलरामपुर लोकसभा से तो चुनाव जीत गए, लेकिन मथुरा और लखनऊ से हार गए। वहीं मथुरा में राजा महेन्द्र प्रताप की जीत हुई और अटलजी की जमानत तक जब्त हो गई।

भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़े अटलजी को 23 हजार 620 वोट मिले और उनकी जमानत भी नहीं बची। वे इस चुनाव में चौथे नंबर पर रहे थे।

आज भी ताजा हैं वो यादें...
इस संबंध में वर्तमान में मथुरा की नरसिंह कॉलोनी में रह रहे अशोक शर्मा 52 वर्षीय बताते हैं कि मेरे पिताजी तब मथुरा में ही थे। इसके बाद वे मेरी पैदाइश से पहले ग्वालियर चले गए और अब हम वापस मथुरा में हैं।

अशोक के अनुसार उनके पिता बताते थे कि अटल जी की जीत मथुरा में तकरीबन पक्की थी, यानि यदि हारते तो भी वे दूसरे नंबर पर ही रहते, लेकिन उनके एक भाषण के बाद फिजां बदल गई। उनके अनुसार पिताजी बताते थे कि अटल जी तो हार गए पर मथुरा की जनता आज तक न तो उस चुनाव को भूली और न ही अटल जी को।

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