प्राकृतिक रंगों से तैयार 24 पेंटिंग्स में जीवंत हो उठे मेघदूतम के 275 श्लोक

प्राकृतिक रंगों से तैयार 24 पेंटिंग्स में जीवंत हो उठे मेघदूतम के 275 श्लोक
प्राकृतिक रंगों से तैयार 24 पेंटिंग्स में जीवंत हो उठे मेघदूतम के 275 श्लोक

Pradeep Kumar Sharma | Updated: 22 Sep 2019, 03:00:00 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

भोपाल. स्वराज भवन वीथिका में शनिवार से तीन दिवसीय एकल प्रदर्शनी की शुरुआत हुई। इसमें जबलपुर के चित्रकार रघुबीर अंबर की 28 पेंटिग्स प्रदर्शित की गई है। अंबर की ये पेंटिंग्स उनकी 40 साल की पेंटिग यात्रा है। प्रदर्शनी की खास बात कवि कालीदास की कृति मेघदूत का संपूर्ण चित्र प्रदर्शन है, जिसको उन्होंने 24 कविताओं में प्रदर्शित किया है। पेंटिग्स में दिखाए जा रहे मेघदूत के श्लोकों के हिंदी उच्चारण के साथ यहां एग्जीबिट किया गया।

डेढ़ महीने की मेहनत से तैयार हुई पेंटिंग्स
अंबर ने बताया कि 275 श्लोकों की कृति को 24 पेंटिग्स में समाहित किया है, क्योंकि कुछ पेंटिग्स में चार से छह श्लोकों के अर्थ का चित्रण एक ही पेंटिग में है। अंबर बताते हैं कि इन पेंटिंग्स को बनाने में एक से डेढ़ माह तक का समय लगा। इन चित्रों को मैंने नेचुरल कलर्स से तैयार किया है। इनमें फूलों, पत्तियों, लहसुन के छिलकों आदि का उपयोग कर पहले कलर तैयार किया और बाद में पेंटिग को बनाया।

इन श्लोकों पर तैयार की पेंटिंग्स
कर्तव्य कर्म में एक दिवस, जब चूक गया था यक्ष एक।
तो यक्षराज स्वामी कुबेर, क्रोधित हो बैठे शाप दिया।।


बिन पत्नी बारहमास उसे, वन बसने का संताप दिया।
हो द्रवित सोचने लगा यक्ष, क्यों सुख में दुख का जाप दिया।।


फूलों से करती है सिंगार, उल्का में, रमणी सुंदरियाँ।
कानो में पहने शिरीष खिले, कर में पंकज के छिले फूल।।


घुंघराले बालों में गूंथे, चंपा जूही के मिले फूल।
जुड़े की बेणी में खिलते। नव कुरवक के अध खिले फूल।।


सम्मुख शोभित जो रत्न दीप, किरणें छिटकाते हैं अनंत।
निर्वसना होने के डर से, दोहरी होती हैं लज्जा से।


पावन प्रियतम का पा स्पर्श, पागल होतीं सुख सज्जा से।
होता संचार काम का जब, आलिंगन रत प्रियमज्जा से।


दोनों वृक्षों के बीच लगा, है स्वर्ण दंड मणि युक्त एक।
ऊपर जिसके स्फटिक शिला, नीचे पन्नों के हैं पाये।।


वह मित्र नीलकंठी मयूर, बसने को जिस पर नित आये।
दे ताली ताल नचाती प्रिये, कंगनों को छन छन छनकाये।।


अति सूंदर सरल प्रिया मेरी, पहने मलीन रंगहीन वस्त्र।
अपनी गोदी में वीणा रख, दुख गीतों में रोती होगी।।


नैनों से अश्रु बहे उनसे, तर वीणा को धोती होगी।
गाने के सस्वर कौशल को, वह बार-बार खोती होगी।।

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