अन्नदाता नाराजः हल्ला, हंगामा और उपद्रव, किसान फिर भी खाली हाथ

मध्यप्रदेश में किसानों का आंदोलन जारी है। एक ओर सरकार का दावा है कि किसान आंदोलन खत्म कर दिया गया है। जबकि दूसरी ओर किसानों का एक धड़ा है जो यह मानने को तैयार ही नहीं है कि आंदोलन खत्म हो गया है।

By: Manish Gite

Published: 05 Jun 2017, 05:18 PM IST


शैलेंद्र तिवारी
भोपाल। मध्यप्रदेश में किसानों का आंदोलन जारी है। एक ओर सरकार का दावा है कि किसान आंदोलन खत्म कर दिया गया है। जबकि दूसरी ओर किसानों का एक धड़ा है जो यह मानने को तैयार ही नहीं है कि आंदोलन खत्म हो गया है। उसी एक धड़े की कमान संभालने वाले शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी ने ऐलान किया है कि वह किसानों की मांगों को लेकर सात जून को पूरा प्रदेश बंद करेंगे।

उधर, मुख्यमंत्री ने एक बार फिर दोहराया है कि वह किसानों के साथ हैं और किसानों की हर वाजिब मांग को पूरा करेंगे। हालत यह है कि मुख्यमंत्री पिछले दो दिनों में पांच जगहों पर किसानों के साथ होने की बात कर चुके हैं। लेकिन इस पूरी लड़ाई में अब भी सवाल यही बना हुआ है कि हल्ला, हंगामा और इतने उपद्रव के बाद किसान को आखिर क्या मिला। आठ रुपए प्रति किलो पर प्याज की खरीदी का भरोसा। बाकी की जरूरी बातों पर न सरकार ने गौर किया और न ही किसानों ने। आंदोलन के तौर तरीकों ने भी सवाल खड़ा किया कि वाकई में यह उन्हीं किसानों का आंदोलन था, जो धरती का सीना चीरकर अन्न उगाते हैं। या फिर यह एक राजनीतिक साजिश थी। जिसे किसानों के बहाने शुरू किया गया और सरकार को निशाने पर लिया गया। 

दरअसल, यह पहली दफा नहीं है कि जब मध्यप्रदेश में किसानों ने इस तरह से उग्र आंदोलन किया है। इससे पहले भी किसान अग्र आंदोलन कर चुके हैं। भारतीय किसान संघ के बैनर तले कुछ साल पहले भोपाल को किसानों ने ट्रैक्टर और ट्राली से घेर लिया था। भोपाल आने और जाने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया था। आंदोलन की कमान संभाल रहे शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया।

आंदोलन ऐसा था कि सरकार के रौंगटे खड़े हो गए थे। सरकार न चाहते हुए भी कक्काजी के सामने झुकी और मांगे मानने की बात कही। यह बात और है कि सरकार मांगों को मानकर मुकर गई। हुआ कुछ भी नहीं। लेकिन इस आंदोलन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कक्काजी को आमने—सामने ला दिया। संघ के किसान संगठन को संभालने वाले कक्काजी को बड़े ही बेमुरव्व्त से किसान संघ से अलविदा कह दिया गया। अपने ही घर से निकलने के बाद उन्होंने सरकार को घेरने की खूब कोशिश की, लेकिन कोई ऐसा आंदोलन खड़ा नहीं कर सके जो अपनी आवाज से सरकार को सोचने पर मजबूर कर देता। 

यह भी पढ़ें
farmers strike

संघ और शिवराज की नूरा-कुश्ती
संघ और शिवराज सिंह चौहान की नूरा-कुश्ती जगजाहिर है। संघ सरकार पर शिकंजा कसने के लिए आए दिन कुछ न कुछ करता रहता है। संघ का सरकार पर नियंत्रण रखने का यह अपना अलहदा तरीका है। यही वजह है कि किसानों के मसले पर संघ आए दिन सरकार को घेरने की कोशिश करता रहता है। यह बात और है कि संघ के हमले पर सरकार बचाव की मुद्रा में ही रहती है। उसके बाद आक्रामक होने का कोई रास्ता शेष नहीं रहता है। कारण साफ है कि दोनों ही स्थिति में नुकसान उसका ही होता है।

ये नूरा-कुश्ती ही है कि साल के शुरुआत में भारतीय किसान संघ ने हरदा में कांग्रेस विधायक रामकृष्ण दोगने का सम्मान किया। सम्मान इस बात के लिए था कि विधानसभा के भीतर किसानों की आवाज उठाने वाले विधायकों में दोगने सबसे आगे रहे। सवाल यहीं पर था कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि संघ को किसानों की आवाज उठाने वालों में कांग्रेस विधायक ही नजर आया। भाजपा का विधायक क्यों नहीं। क्या यह सरकार के साथ चल रही संघ की नूरा—कुश्ती का इशारा तो नहीं था। आखिर कांग्रेस विधायक का सम्मान कर संघ ने अपनी ही सरकार और उसकी भूमिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया था। 

कौन है इस किसान आंदोलन के पीछे
पांच दिन पहले एक आंदोलन इंदौर से शुरू हुआ। किसान सेना के नाम पर आंदोलन की शुरुआत हुई। भारतीय किसान संघ से लेकर दूसरे संगठनों ने भी इसमें शामिल होने की बात कही। पहले दिन सिर्फ दूध फैलाने से लेकर सड़कों पर सब्जी फेंकने का काम किसानों ने किया। लेकिन दूसरा दिन आते—आते आंदोलन हिंसक हो गया। ऐसा हिंसक कि आगजनी की घटनाएं हुईं। प्रशासन को काबू करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

अधिक संख्या में पुलिस बल का उपयोग करना पड़ा। इंदौर से शुरू हुआ आंदोलन खंडवा, रतलाम होते हुए पूरे मालवा में फैलना शुरू हो गया। आक्रोश के नाम पर हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। कांग्रेस ने आंदोलन को पीछे से हवा देने की कोशिश की। हालांकि जब पानी सर से पार हो गया तो मुख्यमंत्री ने उज्जैन में किसानों के एक गुट से बैठक कर आंदोलन पूरा होने की बात कह दी। किसानों की बातें मानते हुए कई ऐलान कर दिए। कई के आदेश भी जारी हो गए। 

किसानों को लेकर यह हुई घोषणाएं
-किसान कृषि उपज मंडी में जो उत्पाद बेचते हैं उनका 50% उन्हें अब नकद भुगतान प्राप्त होगा तथा 50% RTGS किया जाएगा
-गर्मी की मूंग की फसल को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी
-किसानों का प्याज 8 रुपए प्रति किलो पर सरकार खरीदेगी यह खरी
 दी तीन-चार दिन में चालू हो जाएगी तथा जून के अंत तक चलेगी
-सब्जी मंडियों में किसानों को ज्यादा आड़त देनी पड़ती है इसे रोकने के लिए सब्जी मंडियों को मंडी अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा।
-फसल बीमा योजना को ऐच्छिक बनाया जाएगा नगर एवं ग्राम निवेश एक्ट के अंतर्गत जो भी किसान विरोधी प्रावधान होंगे उन्हें हटाया जाएगा।
-किसानों ने आंदोलन किया है उसमें किसानों के विरुद्ध जो प्रकरण बने हैं उन्हें समाप्त किया जाएगा।
-मध्य प्रदेश सरकार किसान हितेषी सरकार है तथा सदेव किसान की कल्याण में कार्य करती रहती है अतः में अपील करता हूं कि यह आंदोलन वापस लिया जाए।

(किसानों ने फलों को सड़कों पर फेंककर उस पर ट्रेक्टर चलवा दिए, पैरों से भी कुचला।)

सबकी अपनी राजनीति है
किसानों के इस आंदोलन की शुरुआत किसान सेना ने की। किसान सेना अचानक से अस्तित्व में आई। इतना ही नहीं, भारतीय किसान संघ से लेकर दूसरे किसान संगठन भी इस आंदोलन से जुड़ गए। लेकिन कांग्रेस ने जैसे ही आंदोलन के साथ जुड़ने का प्रयास किया। सरकार एक्टिव हो गई। उसने पूरी ताकत से आंदोलन को खत्म कराने की शुरुआत करा दी। सांवेर से विधायक राजेश सोनकर को जिम्मेदारी दी गई कि वह आंदोलन कर रहे किसानों में सेंधमारी करें और उसे खत्म कराने की कोशिशें शुरू करें।

मुख्यमंत्री के साथ एक गुट की बैठक उज्जैन में कराई गई, जिसमें आंदोलन को खत्म करने पर सहमति बनी। यह गुट कोई और नहीं, बल्कि भारतीय किसान संघ का था। जिसने आंदोलन को खत्म करने पर सहमति दे दी। यही संघ की राजनीति है। आंदोलन को चरम पर ले जाकर अचानक से यूं ही खत्म कर दिया जाता है। लेकिन किसान संघ के ही दूसरे धड़े को यह नागवार गुजरा और उसने आंदोलन को खत्म करने से इनकार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि इनकार करने वाले किसान नेता को जेल भेज दिया गया। बात यहीं नहीं थमी अब कांग्रेस विधायक और राष्ट्रीय सचिव जीतू पटवारी के भाई को किसानों को भड़काने का आरोपी बनाया गया है।

(किसानों ने अपनी उपज को नष्ट कर दिया।)

कुल मिलाकर आंदोलन किसानों के हाथ से निकलकर राजनीतिक हो गया। या कह सकते हैं कि अब इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। भाजपा जहां इसे कांग्रेसी कहकर पीछा छुड़ाना चाह रही है। वहीं, कांग्रेस किसानों के कंधे पर बैठकर सरकार को घेरने का सपना देख रही है। यही वजह है कि जब आंदोलन खत्म होने को है तब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव इस आंदोलन में कांग्रेस के लोगों को सीधे तौर पर शामिल होने का हुक्म दे रहे हैं।



फायदा उठाने में पीछे रह गई कांग्रेस
कांग्रेस ने किसानों के इस आंदोलन का पूरा फायदा उठाने की कोशिश की। आंदोलन को हवा देने से लेकर उसके राजनीति नफा-नुकसान की पूरी रणनीति भी बन गई। कांग्रेस के बड़े नेताओं दिग्वजय सिंह से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी किसान आंदोलन के बहाने सरकार की किसान नीतियों पर घेरने की कोशिश की। लेकिन सरकार ने अचानक से आंदोलन को खत्म कराकर कांग्रेस की पूरी रणनीति ही बेकार कर दी।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने जारी अपने बयान में सोमवार को कहा, प्रदेश में जारी किसानों के अहिंसक आंदोलन पर राज्य सरकार के निर्देश पर फैलाये जा रहे पुलिस की निंदा करता हूं और आंदोलन को पार्टी का पूरा समर्थन दिए जाने की घोषणा करता हूं।

यादव ने कांग्रेसजनों से यहाँ तक कहा है कि वे इस आंदोलन में प्रदेश के किसानों के सहभागी भी बन उनके साथ मैदान भी पकड़ें। लेकिन सवाल यहां भी वही है कि आखिर यह बात बोलने में अरुण यादव को इतना वक्त क्यों लग गया। क्या किसी दबाव में आकर उन्होंने इस आंदोलन में कांग्रेस को उतारने का ऐलान किया है। क्योंकि इस किसान आंदोलन के पीछे कांग्रेस के विधायक का चेहरा आ रहा है। अब कांग्रेस के अंदर भी अपनी शह और मात है। कुल मिलाकर रेत खनन के बाद किसानों पर कांग्रेस की एक बार फिर राजनीतिक हार है।

यह भी पढ़ें
arun yadav

यह भी पढ़ें
cm shivraj singh chauhan is ANGRY
Show More
Manish Gite
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned