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rivers of mp: अब इसलिए गंदी नहीं हो रही मध्यप्रदेश की नदियां, जानिए कारण

rivers of madhya pradesh: अब मध्यप्रदेश की अधिकांश नदियों का पानी एमपीपीसीबी की रिपोर्ट में ए और बी श्रेणी का पाया जा रहा है, जबकि पानी में गंदगी साफ दिख रही है

भोपाल

Updated: April 29, 2022 09:29:23 pm

भोपाल. नदियों के पानी की जांच के बदले मापदंडों के चलते लगभग सभी नदियों का पानी मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी रिपोर्ट में स्वच्छ हो गया है। पानी साल भर से ए और बी श्रेणी का बना हुआ है। जबकि हकीकत में नदियों के पानी में सीवेज आदि मिलने के कारण खूब गंदगी घुली हुई है। इससे कई जगह बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी भी अधिक है। फीकल कॉलीफॉर्म और टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया भी नदियों के पानी में काफी मात्रा में हैं जो नुकसानदेह हो सकते हैं। प्रदूषण नियंत्रण के केवल मापदंड ही नहीं बदले बल्कि सैंपल लेने के तरीके में भी बदलाव के चलते नदियां स्वच्छ हो गई हैं। नदियों में बढ़ते प्रदूषण की िस्थति और एनजीटी में उसकी रिपोर्ट देने की बाध्यता के चलते सीपीसीबी ने मापदंडों में बदलाव किया है इसके तहत फीकल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया को प्रति 100 एमएल पानी में 2500 एमपीएन तक मान्य किया गया है वहीं टोटल कॉलीफॉर्म 5000 तक मान्य हैं। जबकि पहले के मापदंडों में यह 50 तक ही मान्य किए जाते थे। अब इतनी बड़ी संख्या में मान्य होने के चलते नदियों का पानी असुरक्षित की श्रेणी से बाहर हो गया है। एमपीपीसीबी की मार्च माह ही वाटर क्वालिटी इंडेक्स रिपोर्ट में केवल खान, चंबल, शिवना और क्षिप्रा नदी का पानी ही संतोषजनक श्रेणी का नहीं पाया गया है। अन्य सभी नदियों का पानी संतोषजनक है। जबकि अभी नर्मदा नदी में ही बड़ी मात्रा में एल्गी तैर रही है। प्रदूषण के कारण ही इसकी मात्रा बढ़ती है। एमपीपीसीबी के सदस्य सचिव एए मिश्रा ने इस संबंध में ज्यादा बात नहीं की उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि मापदंड सीपीसीबी ने तय किए हैं यह तमाम परििस्थतियों को देखते हुए तय किए जाते हैं।
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नर्मदा नदी की आंवली घाट पर ऐसी है स्थिति
किनारे की बजाय बीच में जाकर लिए जा रहे सैंपल

पहले जहां नदी के पानी की सैंपलिंग किनारे से होती थी क्योंकि किनारे के पानी का ही घाटों पर अधिकांश लोग उपयोग करते हैं। वे न केवल इसमें स्नान करते हैं बल्कि आचमन के लिए भी नदी के पानी का उपयोग करते हैं। लेकिन अब पीसीबी के अमले द्वारा नदी के बीच में से सैंपल लिए जा रहे हैं । नदी के बीच में क्योंकि प्रवाह तेज रहता है इसलिए किसी तरह की गंदगी टिक नहीं पाती इसलिए असलियत सामने नहीं आ पाती।
हैवी मेटल्स की जांच ही नहीं
मापदंडों की एक खास बात यह भी है कि इसमें पानी में कितने हैवी मेटल मौजूद हैं इसकी जांच ही नहीं की जा रही है। जबकि नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट मिलने के बाद उसके पानी में हेवी मेटल्स की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है। बेतवा नदी में औद्योगिक क्षेत्रों के पास के पानी में पहले हेवी मेटल मिले भी हैं। लेकिन अब इसकी जांच नहीं की जा रही है।
कागजों में स्वच्छ लेकिन आसपास के जलस्रोत दूषित होंगे

पर्यावरणविद डॉ सुभाष सी पांडे के अनुसार नदियों का पानी मापदंड बदलकर भले ही स्वच्छ कर दिया जाए लेकिन इसके दुष्प्रभाव तो देखने को मिलते ही हैं। क्योंकि इसके आसपास जो कुएं और बोरवेल होंगे उनके पानी पर भी नदी का प्रभाव पड़ता है। यदि नदी का पानी प्रदूषित होगा तो उनका पानी भी दूषित होने की पूरी संभावना रहती है। मैंने कलियासोत नदी के आसपास के भूजल स्रोतों के पानी की जांच की थी उसमें आसपास के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में पानी पीने योग्य नहीं पाया गया। इससे आप आसानी से समझ सकते हैं कि यह कितना खतरनाक हो सकता है।

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