ऐसा होता है एक आम आदमी से संन्यासी बनने तक का सफर

ऐसा होता है एक आम आदमी से संन्यासी बनने तक का सफर
Sadhu

Alka Jaiswal | Publish: Apr, 25 2016 07:15:00 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

संन्यासी बनने के लिए अलग-अलग चरणों में दीक्षा दी जाती है। जानकारों की मानें तो जब शिष्य अपने गुरू को दीक्षा देता है तो उस दौरान उसे अपने माता-पिता का भी तर्पण करना पड़ता है।


भोपाल। उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ में कई संन्यासी शामिल हुए। लेकिन क्या आपको पता है कि किसी भी मनुष्य को संन्यासी बनने के लिए कितने कठिन तप से गुज़रना पड़ता है। उसके रूप से उसका नाम सब बदल जाता है। कहा जाता है कि संन्यास लेने के बाद व्यक्ति शिव स्वरूप हो जाता है। आइए आपको बताते हैं कि किसी भी व्यक्ति को एक आम इंसान से संन्यासी बनने तक में क्या-क्या करना पड़ता है।

संन्यासी बनने के लिए अलग-अलग चरणों में दीक्षा दी जाती है। जानकारों की मानें तो जब शिष्य अपने गुरू को दीक्षा देता है तो उस दौरान उसे अपने माता-पिता का भी तर्पण करना पड़ता है जिसके बाद संसार से उसका कोई संबंध नहीं रह जाता है।

पहला चरण- पांच गुरूओं को दीक्षा
सबसे पहले शिष्य अपने पांच गुरुओं से दीक्षा लेता है। इन पांच गुरुओं में से चोटी गुरू सबसे प्रमुख माने जाते हैं। बाकी 4 गुरू इस दीक्षा के साक्षी कहलाते हैं। जब गुरू द्वारा शिष्य अपनी पहली दीक्षा ग्रहण कर लेता है तो वह आम व्यक्ति से महापुरुष बन जाता है। इन पांच गुरुओं में शामिल होते हैं-
चोटी गुरु: यह गुरू सबसे पहले शिष्य की चोटी कटवाता है।
भगवा गुरु: चोटी काटने के बाद यह गुरु अपने शिष्य को भगवा वस्त्र धारण कराता है।
स्र्द्राक्ष गुरु: इसके बाद शिष्य को स्र्द्राक्ष की माला धारण कराई जाती है। जो गुरु शिष्य को रुद्राक्ष धारण कराता है उसे रुद्राक्ष गुरु के नाम से जाना जाता है।
लंगोटी गुरु: स्र्द्राक्ष धारण कराने के बाद शिष्य को लंगोट पहनाई जाती है। जो भी गुरु लंगोट पहनाता है उसे लंगोट गुरु के नाम से जाना जाता है।
भभूत गुरु: पांचवे गुरु शिष्य के संन्यास लेने के बाद उस पर भस्म लगाते हैं इसलिए इन्हें भभूत गुरु के नाम से जाना जाता है।

दूसरा चरण- विर्जा हवन दीक्षा
संन्यासी जब विर्जा हवन की दीक्षा ग्रहण करता है तब सर्वप्रथम उसका मुंडन किया जाता है। उसके बाद वह जनेऊ धारण कर हाथ में दंड व जलपात्र लेकर नदी के तट पर जाता है। यहां उसे अखाड़े द्वारा विर्जा हवन दीक्षा दी जाती है। इस दीक्षा के दौरान महापुस्र्ष पहले अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी व बच्चों (परिजन) का पिंडदान करता है। इसके पश्चात वह अपना भी पिंडदान कर देता है। पिंडदान करने के बाद उसका संन्यास जीवन में दूसरा जन्म होता है। इसमें सारे सांसारिक संबंध खत्म हो जाते हैं। यह दीक्षा उज्जैन सिंहस्थ, हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक कुंभ में दी जाती है। सिंहस्थ में विर्जा हवन की दीक्षा दत्त अखाड़े घाट में दिलाई जाएगी।

तीसरा चरण- धूनी तपन संस्कार
यह संन्यास धारण करने का तीसरा चरण होता है। इस क्रिया को सुबह 3:30 बजे किया जाता है। इस क्रिया को करने से पूर्व रात्रि को धूनी जलाई जाती है और भजन किए जाते हैं। इसके बाद सुबह आचार्य महामंडलेश्वर महापुस्र्ष संन्यासी को आमंत्रित किया जाता है और मंत्र उच्चारण से उसे नया नाम दिया जाता है। जिसके बाद वह शिष्य संन्यासी बन जाता है।

चौथा चरण- दिगंबर दीक्षा
शिष्य के संन्यासी बनने के बाद जो दिगंबर उसे दीक्षा देते हैं वह छठे गुरु कहलाते हैं। यह दीक्षा धर्म ध्वजा के नीचे दी जाती है जिसके बाद अब शिष्य दिगंबर साधु के रूप में पहचाना जाता है। इस दीक्षा को लेने के बाद वह सिर्फ कुछ समय के लिए ही नग्न रह सकता है।

पांचवा चरण- श्री दिगंबर दीक्षा
इस दीक्षा के दौरान दिगंबर साधु अखाड़े को गुरु दक्षिणा देता है जिसके बाद अखाड़े द्वारा उसकी पुकार लगाई जाती है। इस क्रिया के बाद उस दिगंबर साधु को श्री दिगंबर साधु के नाम से पुकारा जाता है। इस दीक्षा के बाद वह 12 महीने नागा के रूप में रह सकता है लेकिन दीक्षा लेने के बाद वह ना तो पलंग पर सो सकते हैं और ना ही सिले हुए कपड़े पहन सकते हैं। इस दीक्षा को लेने के बाद इन्हें भगवान शिव के समान पूजा जाने लगता है।

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