प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक मिले काउंसलिंग, स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हो मानसिक स्वास्थ्य

सुसाइड प्रिवेंशन पॉलिसी लाने को लेकर शहर के मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने शुरू की मुहिम

By: hitesh sharma

Updated: 20 Sep 2020, 07:43 PM IST

भोपाल। कोरोना महामाही आने के बाद लोगों ने खुद को घरों में कैद कर लिया। अचानक लाइफस्टाइल बदलने और नौकरियां चले जाने से बड़ी संख्या में लोग डिप्रेशन का शिकार हो गए। देश में आत्महत्या के मामले बढऩे पर आत्महत्या रोकथाम नीति पर नेशनल पॉलिसी बनाने की मांग शुरू हो गई। सुसाइड प्रिवेंशन पॉलिसी लाने को लेकर शहर के डॉक्टर सत्यकांत त्रिवेदी ने ट्विटर पर #SuicidePreventionPolicy मुहिम छेड़ रखी है। अब इससे देशभर के मनोचिकित्सक जुड़ चुके हैं।


डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की 2019 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 2.3 लाख आत्महत्या कर रहे है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने हाल में ही पिछले साल (2019) के जो आंकड़े जारी किए है उसके मुताबिक देश में हर दिन औसतन 381 लोगों ने आत्महत्या की है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में देश में 1,39,123 लोगों ने विभिन्न कारणों से आत्महत्या की।

स्कूली पाठ्यक्रम में किया जाए शामिल
डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि अभी बड़े स्कूलों में काउंसलर्स की नियुक्ति होने लगी है, लेकिन शासकीय स्कूलों में अभी भी इसे किसी विषय विशेषज्ञ की तरह जरूरी पद नहीं समझा जाता। पढ़ाई, परीक्षा और कॉमपीटिशन एग्जाम के चलते भारी तनाव से गुजरते हैं। डिप्रेशन में आकर वे सुसाइड जैसा कदम उठा लेते हैं। यदि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर में काउंसलर्स हों तो वे पीडि़त की पहचान कर समय पर उसकी मदद कर सकेगा। अब तक स्कूल या कॉलेज के पाठ्यक्रम में भी इसे सब्जेक्ट के रूप में शामिल नहीं किया गया। यदि स्टूडेंट्स इसे पढ़ेंगे तो वे खुद ये पहचान कर पाएंगे कि वे कब मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से प्रभावित हैं।

छोटे शहरों में भी मिलेगी सुविधा
आत्महत्या के मामले हर पांच साल में डबल होते जा रहे हैं। देश में इस समय महज पांच हजार मनोचिकित्सक हैं। ये एक दिमागी बीमारी है। मानसिक स्वास्थ्य से बड़े ही नहीं बच्चे भी जूझ रहे हैं। यदि व्यक्ति को सही समय पर इलाज मिल जाए तो उसके मन से सुसाइड का खयाल निकल जाता है। अभी छोटे शहरों में मनोचिकित्सक की उपलब्ध नहीं है। पॉलिसी बनने से प्राथमिक स्तर पर ही इलाज की सुविधा मिल सकेगी।

- डॉ. अंजली छाबरिया, मनोचिकित्सक, मुंबई

हर व्यक्ति के स्क्रीनिंग की जरूरत
2017 में कानून में बदलाव कर आत्महत्या की कोशिश करने वाले पीडि़त व्यक्ति को सजा देने का प्रावधान खत्म किया गया। शासन स्तर पर लगातार एक्टिविटी चलाए जाने की जरूरत है। जिस तरह नर्सिंग स्टाफ से लेकर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तक घर-घर जाकर व्यक्ति के स्वास्थ्य को लेकर स्क्रीनिंग करता है, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य, उदासिनता को लेकर भी स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। पॉलिसी आने पर आत्महत्या की दर होगी। दवाइयों की उपलब्धता बढ़ेगी। सस्ता इलाज मिलेगा। अभी हर सात में से एक व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। स्कूल, कॉलेज लेवल से लेकर वर्क प्लेस तक सेशन की आवश्यकता है।

डॉ. हरिश शेट्टी, मनोचिकित्सक, मुंबई

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भ्रांतियां ज्यादा
आत्महत्या मौत की एक ऐसी वजह है, जिसे रोका जा सकता है। किसी भी सामान्य व्यक्ति को जिंदगी में कभी ना कभी आत्महत्या का खयाल मन में आ ही जाता है। जो इस पल से गुजर चूके हैं, वे काफी स्टॉन्ग हो जाते हैं। अभी समाज में इस विषय को लेकर भ्रांतियां ज्यादा है। समाज में अभी भी इस विषय पर खुलकर बात नहीं की जाती है। इसे ऐसी समस्या समझा जाता है जिस पर बात होने से सोशल स्टेट्स प्रभावित होता है। इसे अन्य बीमारियों की तरह नहीं समझा जाता।

डॉ. सत्येन शर्मा, मनोचिकित्सक, पटियाला

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी मिले सुविधा
अभी समाजिक स्तर पर भी मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी समस्या है। कोरोना महामारी के बाद लाइफस्टाइल चेंज होने, तंगी और जॉब जाने से लोगों का मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है। जब भी आर्थिक स्तर पर समाज तरक्की करता है, तो मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ती हैं। डिप्रेशन का शिकार व्यक्ति को सांत्वना की नहीं, देखभाल की जरूरत होती है। यदि ऐसे व्यक्ति की काउंसलिंग हो तो उसकी जान बचाई जा सकती है। पॉलिसी आने से हर पेशेंट को मनोचिकित्सक की मदद मिल सकेगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर भी उसका प्रारंभिक उपचार हो सकेगा। एक टोलफ्री नंबर भी होना चाहिए, जहां पीडि़त को 24 घंटे नि:शुल्क परामर्श मिल सके।

डॉ. विशाल छाबरा, मनोचिकित्सक, दिल्ली

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