हिंदी हैं हम...हिंदी संस्करण ही विश्वसनीय

हिंदी भाषी राज्य में हिंदी ही होगी मान्य, मप्र हाईकोर्ट का अहम फैसला

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा कि मप्र जैसे हिंदी भाषी राज्य में यदि किसी  अधिसूचना, नियम या अधिनियम का अंग्रेजी व हिंदी दोंनो भाषाओं में प्रकाशन हुआ है और दोनों प्रारूपों में भ्रम की स्थिति है, तो एेसी दशा में हिंदी संस्करण को ही विश्वसनीय माना जाएगा। चीफ जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता में जस्टिस शांतनु केमकर व जस्टिस जेके माहेश्वरी की फुल बेंच ने इस मत के साथ तीन अपीलों को अंतिम निराकरण के लिए संबंधित खंडपीठों को भेज दिया है।
संवैधानिक प्रश्न निराकरण को भेजा
अलग-अलग खंडपीठों में अलग-अलग मसलों पर दायर इन अपीलों को फुल बेंच के समक्ष इस संवैधानिक प्रश्न निराकरण को भेजा गया था। टेक्नोफेब इंजीनियरिंग लिमिटेड, हरनाथ सिंह चौहान व अन्य की ओर से ये अपीलें दायर की गई हैं। अलग-अलग खंडपीठों में सुनवाई के दौरान यह संवैधानिक प्रश्न उठा कि किसी अधिसूचना, नियम या अधिनियम के हिंदी-अंग्रेजी दोनों में है  तो एेसे में किस भाषा के प्रारूप पर विश्वास किया जाए। इस मसले का निराकरण करने के लिए  इस प्रश्न पर फुल बेंच ने विचार किया।
अल्पविराम बदल देता है अर्थ
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र तिवारी, आरके संघी ने कोर्ट को बताया कि मप्र कोर्ट फीस निर्धारण (संशोधन) अधिनियम 2008 की अधिसूचना के अंग्रजी प्रारूप में एक स्थान पर काउंटर क्लेम शब्द के बाद व एक स्थान पर और मेमोरंडम शब्द के पूर्व कॉमा का उपयोग किया गया, जबकि हिंदी प्रारूप में इनका इस्तेमाल नहीं हुआ। जिससे दोनों शब्दों के अर्थ दोनों प्रारूपों में अलग-अलग हो गए और भ्रम की स्थिति निर्मित हुई। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि  मप्र अधिकृत भाषा अधिनियम 1957 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि इसके मुताबिक भ्रम की दशा में हिंदी प्रारूप के अर्थ को ही मान्य किया जाएगा।
न्यायसंगत हो कोर्ट फीस
तर्क दिया गया कि मप्र कोर्ट फीस निर्धारण (संशोधन) अधिनियम 2008 के लागू होने के बाद दायर अपील पर पूराने अधिनियम के तहत कोर्ट फीस नहंी  वसूली जा सकती। इससे गरीब व सर्वहारा वर्ग को न्याय मिलने में दिक्कत होगी। इसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए कहा कि कोर्ट फीस अनुपातिक व न्यायसंगत होना चाहिए, ताकि लोगों को न्याय मिल सके।

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