कागभुशुंड के स्वरूप हैं कौए , पर छतों पर सूख रहा काग ग्रास

- श्राद्ध में गौ, काग, श्वान, चींटी और भिक्षुक के लिए निकालते हैं ग्रास

- शहर से कौए हुए गायब, इसलिए पूरी नहीं हो पा रही परंपरा

By: praveen malviya

Published: 25 Sep 2021, 11:24 PM IST

प्रवीण मालवीय

भोपाल. परंपरानुसार श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को लगाए जाने वाले भोग को उन तक पहुंचाने का माध्यम जीवों को बनाया गया है। इनमे कौए सबसे प्रमुख हैं, लेकिन अब शहर में इनका ग्रास छतों पर रखा-रखा सूख रहा है। दरअसल शहर में कौओं की संख्या बिल्कुल नगण्य हो गई है। इसके चलते पितरों का श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु पंच ग्रास की रस्म को ठीक तरीके से पूरा ही नहीं कर पा रहे हैं।

भगवान के हाथ पाई थी खीर
पंडित विष्णु राजौरिया बताते हैं, शास्त्रों में कौओं को कागभुशुंडी ऋषि का स्वरूप माना गया है। भगवान श्रीराम जब बाललीला करते थे, तब एक बार वे खीर ग्रहण कर रहे थे, उसी समय एक कौवा उनके हाथ से खीर का पात्र ले उड़ा। यह भी भगवान की ही लीला थी, जिसके प्रताप से कौए ने उनके हाथों से खीर ग्रहण की। तबसे कौओं का महत्व और बढ़ गया। ऐसे ही कई कारणों के पितृ पक्ष में गौ ग्रास के साथ ही काग ग्रास का भी उतना ही महत्व है।

संवेदनशील पक्षी, प्रदूषण, शोर से होता दूर

पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि, कौए संवेदनशील पक्षी होते हैं, जहां प्रदूषण ज्यादा हो गया हो, ध्वनि प्रदूषण हो, वहां कौए रहना पसंद नहीं करते। इसी के चलते शहर में इनकी संख्या कम होते-होते लगभग खत्म हो गई है। इसके चलते काग ग्रास कौवों तक पहुंच ही नहीं पा रहा है, कुछ छतों पर दूसरे पक्षी इन्हें खा रहे हैं, वहीं कुछ इलाकों में तो कोई भी पक्षी नहीं होने से ग्रास सूख ही जाता है।

वन क्षेत्रों और ग्रामों में अब भी दिख रहे कौए

शहर से कौओं ने भले ही पलायन कर लिया हो, लेकिन आसपास के जंगलों और वनों में कौअे दिख रहे हैं। शहर के आसपास के जंगल और गांवों में पक्षी दिखते हैं। कोलार डेम के रास्ते सलकनपुर जाने वाले जंगल के बीच से निकलने वाले रास्ते और इस पर पडऩे वाले गांवों में कई कौवे आज भी कौ ग्रास लेते या यहां-वहां बैठे देखे जा सकते हैं।

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भागवत में भी उल्लेख

पंडित रामकिशोर वैदिक बताते हैं, कि श्राद्ध में भोजन कराने का उल्लेख भागवत में भी मिलता है। भागवत मेंएक श्लोक है, जीवितो वाक्य करणात्, क्षयाहे भूरि भोजनात्। गयायां पिण्ड दानाच्च, त्रिभिर्पुत्रस्य पुत्रता। अर्थात जीवन पर्यन्त माता-पिता की आज्ञान का पालन, मृत्योपरान्त श्राद्ध में खूब भोजन कराना एवं उनके निमित्त गया में जाकर पिण्डदान करने वाले पुत्र की पुत्रता सार्थक है। इसलिए श्राद्ध पक्ष में पंच ग्रास का भी अपना महत्व है।

praveen malviya Reporting
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