चुनावी मास्टर स्ट्रोक संबल योजना पर भारी एट्रोसिटी एक्ट

मैदानी पफीडबैक में एंटीइकंबेसी आने के बाद से भाजपा इस मामले में नए सिरे से मंथन करने में जुटी

Harish Divekar

September, 1308:09 PM

विधानसभा चुनाव में गरीब—मजदूरों का वोट बैंक हथियाने के लिए शिवराज सरकार का मास्टर स्ट्रोक संबल योजना पर एट्रोसिटी एक्ट भारी पडता नजर आ रहा है। सरकार के खजाने से करोडों रुपए लुटाने के बाद भी सरकार को उसका उतना प्रतिपफल नहीं मिल पा रहा है जितने की उम्मीद थी।

शुरुआती दौर में संबल योजना शिवराज के लिए चौथी बार सत्ता में आने की सीढी मानी जा रही थी, लेकिन जैसे—जैसे एट्रोसिटी एक्ट का विरोध पूरे प्रदेश में बढ रहा है, उसके बाद ये माना जा रहा है कि सरकार के लिए इस बार सबसे बडा मुद्दा जाति बनने वाला है।

यदि इसका कोई रास्ता नहीं निकाला तो भाजपा के लिए यह चुनाव परेशानी भरा हो सकता है।
इतना ही नहीं लगातार पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों बढोतरी ने भी भाजपा एंटी माहौल बनाने का काम किया है।हालांकि शिवराज जनआशिर्वाद यात्रा कर जनता के बीच जाकर अपनी योजनाएं गिनाकर नया मध्यप्रदेश बनाने का सपना दिखा रहे हैं, लेकिन वर्गभेद ने उनकी प्रभावााली योजनाओं को कमजोर कर दिया है।

जनता अब नए जातिगत मुद्दे की ओर मुड गई है; मैदानी पफीडबैक में एंटीइकंबेसी आने के बाद से भाजपा इस मामले में नए सिरे से मंथन करने में जुट गई है। इधर प्रदेश सरकार भी अपने प्रशासनिक तंत्र से सवर्ण आंदोलन के बैरोमीटर को नापने में लगी हुर्इ् है।

भाजपा ने मैदानी कार्यकर्ताओं का टारगेट दिया है कि वे सिपर्फ सरकार की योजनाओं का चुनाव प्रचार में इस्तेमाल करें, इसमें सबसे प्रमुख योजना संबल और मुख्यमंत्री समृद्धि योजना का गुणगान करें।

कैसे कम करें पेट्रोल—डीजल का वेट
राजस्थान के बाद गैर आन्ध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल के पेट्रोल—डीजल पर वेट कम करने से मप्र पर भारी दबाव बन गया है। गुजरात चुनाव के चलते मप्र सरकार अक्टूबर 2017 में वेट कम कर चुकी है। अब जब मप्र चुनाव के समय वेट कम करना है तो प्रदेश सरकार का खजाना इसकी इजाजत नहीं दे रहा है, दरअसल प्रदेश की माली हालात बिगड चुकी है, वेज एंड मिन्स के हालात बने हुए हैं।

ऐसे में सरकार पेट्रोल पर वैट घटाने का नया रिस्क नहीं लेना चाहती है।
एक तरफ जहां मध्यप्रदेश इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ी है, वहीं बीजेपी के कुछ नेता खुद को ये कहकर तसल्ली दे रहे हैं कि आने वाले कुछ हफ्ते में इस मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा। बीजेपी के केन्द्रीय नेताओ, सांसदों और विधायकों को सवर्ण वोटर्स के विरोध का सामना करना पड़ा है।

इधर, केन्द्र ने ओबीसी का बंटवारा करने बनाया आयोग

इधर, केन्द्र सरकार ने ओबीसी का आंकड़ा आने से पहले ही ओबीसी के बंटवारे के लिए आयोग बना दिया है. ये आयोग अगर नवंबर में अपनी रिपोर्ट दे देता है तो देश में जातियों को लेकर नया महाभारत शुरू हो जाएगा। ओबीसी की जिन जातियों को आगे बढ़ा हुआ बताकर उन्हें एक छोटे ग्रुप में समेटा जाएगा, वे जातियां ऐसा किए जाने का आधार मांगेंगी, जो सरकार के पास नहीं है। ऐसे में पिछड़ों की प्रभावशाली जातियां बीजेपी से नाराज हो सकती हैं. लेकिन अति पिछड़ी जातियों को सरकार का ये कदम पसंद आएगा।

harish divekar Reporting
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