शहीद भवन : नाटक 'पॉपकॉर्न' का मंचन

क्या कोई ऐसी मशीन है, जो अच्छा इंसान पैदा कर सके.. एक्टर बालेंद्र सिंह बालू की सोलो परफॉर्मेंस

By: दीपेश तिवारी

Published: 24 May 2018, 07:57 PM IST

भोपाल। शहीद भवन में चल रहे तीन दिवसीय रंग-ए-शांति नाट्य समारोह के अंतिम दिन मंगलवार को नाटक 'पॉपकॉर्न' का मंचन हुआ। एक घंटे के इस नाटक में वरिष्ठ रंगकर्मी बालेन्द्र सिंह बालू ने सोलो परफॉर्मेंस दी। नाटक के लेखक आशीष पाठक हैं। नाटक के माध्यम से समाज, सेना और राजनेताओं के कई स्वरूपों को दिखाया गया।

नाटक के माध्यम से ये मैसेज देने का प्रयास किया गया कि समाज और देश की सभी चिंता करते हैं, सभी चिंतक बनकर बैठे हैं, लेकिन कोई भी अच्छा इंसान नहीं बनना चाहता। क्या ऐसी कोई मशीन है जो अच्छा इंसान पैदा कर सके। नाटक की कहानी गांव में रहने वाले रूपक से शुरू होती है। इसमें देशभक्ति कूट-कूटकर भरी है। वो सेना में भर्ती होने के लिए गांव से शहर आ जाता है। यहां अफरा-तफरी के बीच भर्ती एक माह के लिए आगे बढ़ जाती है।

उसके सारे दोस्त गांव वापस लौट जाते हैं। वह गांव से कहकर आया था कि वह नहीं, बल्कि सेना में भर्ती होने के बाद उसका मनी ऑर्डर ही घर आएगा। वह गांव लौटने से इंकार कर देता है। एक दिन उसे उसके गुरु जी मिल जाते हैं। वह उसे समझाते हैं कि वह सेना में भर्ती होने की बजाए पॉपकॉर्न बेचने का काम शुरू कर दे। वह रेलवे स्टेशन पर पॉपकॉर्न बेचना शुरू कर देता है।

बच्ची को भी समाज ने बना दिया पॉपकॉर्न

ट्रेन में बैठे सेना के जवानों को देख रूपक उन्हें पॉपकॉर्न खिलाने जाता है पर जवान उसे पीट देते हैं। वे एक महिला और बच्ची से भी दुव्र्यवहार करते हैं। इस घटना से रूपक दुखी हो जाता है और सेना में जाने का ख्याल छोड़ देता है। तभी एक दिन उसे पता चलता है कि स्टेशन पर रहने वाली दिव्यांग से किसी ने बलात्कार कर दिया है। वह सवाल पूछता है कि क्यों समाज ने बच्ची को ही पॉपकॉर्न बना डाला। नाटक में एक ही कलाकार ने आठ किरदारों को निभाया।

रिश्तों के ताने-बाने को दिखाती है फिल्म 'सांझ और सवेरा'

इधर भारत भवन में चल रहे गुरुदत्त अभिनीत एवं निर्देशित फिल्मों पर एकाग्र फिल्म समारोह के अंतर्गत बुधवार को 'सांझ और सवेरा' का प्रदर्शन किया गया। ये फिल्म 1964 की रोमांटिक ड्रामा फिल्म है। इस फिल्म में गुरु दत्त, मीना कुमारी और मेहमूद ने अभिनय किया है। यह सेवंतलाल शाह द्वारा निर्मित और ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित की गई फिल्म है, जिसका संगीत शंकर जयकिशन द्वारा दिया गया था।

बॉम्बे में अपनी छोटी बहन, मंजू और उनकी विधवा मां रुक्मिणी के साथ रहने वाले एक धनी डॉ. शंकर चौधरी का विवाह उनकी मां वकील मधुसूदन की बेटी माया के साथ तय कर देती हैं लेकिन शंकर और न ही उसकी मां लडक़ी से कभी मिली हैं। एक समारोह के दौरान माया अपने चचेरे भाई, भाई प्रकाश और मधुसूदन की मौजूदगी में सबको पंसद आ जाती है। इस दौरान माया, शंकर की कामेक्षा को खारिज कर देती है, क्योंकि वह व्रत में कर रही है।

बनारस की यात्रा पर, जहां मधुसूदन अब रहते हैं, विश्वनाथ के मंदिर में माया के साथ वह पुनर्विवाह करते हैं। उनका रिश्ता अंतरंग हो जाता है और वह गर्भवती हो जाती है। शंकर एक दिन घर आता हैं और पता लगाता हैं कि प्रकाश और माया गायब हैं। बाद में उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी एक प्रेरक है और वह शायद प्रकाश से शादी कर चुकी है।

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दीपेश तिवारी
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