शांतिधारा के साथ सिद्धचक्र विधान का शुभारंभ, सभी 90 मंदिरों में हुआ अभिषेक

राजधानी में पहली बार संस्कृत भाषा में हो रहा विधान का आयोजन

भोपाल। श्यामला हिल्स स्थित टैगोर होस्टल प्रांगण में सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। इस मौके पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रही। श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार के साथ सिद्धों की आराधना की। विधान का आयोजन मुनि प्रमाण सागर महाराज, मुनि प्रसाद सागर महाराज के ससंघ सान्निध्य में किया जा रहा है।

भोपाल में पहली बार यह विधान संस्कृत भाषा में हो रहा है। यह भी पहला अवसर है जब किसी विधान में एक साथ पांच हजार लोग बैठकर सिद्धों की आराधना कर रहे हैं। रविवार सुबह तेज सर्दी के बावजूद हजारों की तादात में लोग आयोजन स्थल पर पहुंचे। प्रतिष्ठाचार्य अभय भैया ने मंत्रोच्चारण के साथ सभी भक्तों की शुद्धि कराई। आयोजन स्थल पर 90 मंदिर बनाए गए हैं। जहां श्रीजी विराजमान किए गए हैं। मत्रोच्चारण के साथ सभी 90 मंदिरों में भगवान के अभिषेक हुए। इसके बाद आठ पुर्णाजकों ने बोलियों के माध्यम से भगवान की शांतिधारा की। मुनि प्रमाण सागर महाराज, मुनि प्रसाद सागर, मुनि निकलंक सागर महाराज ने संयुक्त रूप से शांतिधारा का वाचन किया। इसके बाद संगीतमय पूजन एवं विधान शुरू हुआ।

कवियों ने लिया आशीर्वाद
देश के जाने माने कवि अरुण जैमनी, संपत सरल, पवन जैन, सुदीप भोपाल, चिराग जैन, रुचि चतुर्वेदी और शबनम अली ने मुनि के पास पहुंचकर उनके दर्शन किए और उनका आशीर्वाद लिया। मुनिश्री ने आशीर्वाद के रूप में अपनी सबसे लोकप्रिय पुस्तक जैन धर्म और दर्शन मुनियों को भेंट की। इस अवसर पर कवियों ने मुनिश्री से अपनी शंकाओं का समाधान भी किया।

शांतिधारा के साथ सिद्धचक्र विधान का शुभारंभ, सभी 90 मंदिरों में हुआ अभिषेक

भागवत कथा: जो नि:स्वार्थ भाव से समाज का कल्याण करे वहीं सच्चा संत
भोपाल। विश्व राधा कृष्ण योग प्रचार समिति की ओर से छोला दशहरा मैदान में भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा के दूसरे दिन पं. ओमप्रकाश शास्त्री ने अनेक प्रसंगों पर प्रकाश डाला, और सत्संग और संत के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि भगवान जब किसी को दंड देते है तो उसके चित्त और दिमाग का हरण कर लेते हैं। जब कोई व्यक्ति क्रोध करें तो उसे क्षमा कर देना चाहिए, किसी को क्षमा करना ही सत्संग का प्रभाव हैं। संत महिमा के बारे में बताते हुए कहा कि संत की कोई जाति नहीं होती, कोई धर्म नहीं होता, जो व्यक्ति जीवन पर्यंत समाज की भलाई और कल्याण के कार्य निस्वार्थ भाव से करता है वही सच्चा संत है। आडंबर ओढ़ लेने वाला व्यक्ति संत नहीं होता। संत तो वह है जो दूसरे को दुख को देखकर अपना दुख समझे और उसका गमन कर दे। कलयुग में व्यक्ति बिना स्वार्थ के कोई भी कार्य नहीं करता, यही दुख का कारण है। जब व्यक्ति बिना स्वार्थ के समाज हित के कार्य करने लगेगा राष्ट्र व समाज उन्नात होगा । इस मौके पर उन्होंने परीक्षित शराब, कपिल जन्म की कथा का वर्णन किया।

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Bharat pandey Desk
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