चिकन-मटन खाने वालों पर दवाएं हो रहीं बेअसर, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

चिकन-मटन खाने वालों पर दवाएं हो रहीं बेअसर, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप
चिकन-मटन खाने वालों पर दवाएं हो रहीं बेअसर, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप

Praveen Shrivastava | Publish: Oct, 12 2019 01:12:21 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

एम्स में नेम्सकॉन वर्कशॉप : एंटीमाइक्रो वियल रजिस्टेंस पर बोले विशेषज्ञ

 

भोपाल. यदि आप चिकन या मटन के शौकीन हैं तो संभल जाएं। लजीज लगने वाला स्वाद आपको बेहद नुकसान पहुंचा रहा है। दरअसल, चूजों और मेमनों को जल्दी बड़ा करने के लिए एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इससे चिकन मात्र एक महीने में बिकने लायक हो जाता है, लेकिन उनमें मौजूद एंटीबायोटिक हमारे शरीर में पहुंचता है। लगातार एंटीबायोटिक से शरीर में मौजूद बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। इसी कारण बीमार होने पर दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। यह बात अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स के अध्यक्ष डॉ. वाईके गुप्ता ने कही। वे एंटीमाइक्रो वियल रजिस्टेंस विषय पर बोल रहे थे।

उन्होंने बताया कि चिकन और मटन के ज्यादा सेवन करने से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। ऐसे में चिकन खाने वाले व्यक्ति के बीमार होने पर उस पर संबंधित एंटीबायोटिक बेअसर साबित होगी।

शहद में भी होता एंटीबायोटिक
चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल के संक्रामक रोग विभाग के डॉ. अब्दुल गफूर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि भारत में बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है, जिसके पीछे तमाम कारण हैं। उन्होंने कहा कि हमारे यहां शहद का उपयोग बहुत ज्यादा होता है, लेकिन इसमें फ्लोरल सेनीकॉल एक तरह का एंटीबायोटिक पाया जाता है। इसके उपयोग से हमारा शरीर भी एंटीबायोटिक प्रतिरोधक हो जाता है।

नदियों के पानी से भी खतरा
डॉ. गफूर ने बताया कि गंगा और यमुना नदियों के पानी में भी एंटीबायोटिक की अत्यधिक क्षमता है। नदियों में एंटीबायोटिक्स मिलने की एक प्रमुख वजह ये है कि गैरजरूरी एंटीबायोटिक्स दवाओं को नदी में फेंक दिया जाता है। दवा फैक्टरियों से निकलने वाला अपशिष्ट भी नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे नदियों का पानी एंटीबायोटिक्स युक्त हो जाता है।

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