बांग्ला की 10 शैलियों में सुनाई महाकाव्य धर्ममंगल की कहानी

आदि विद्रोही नाट्य समारोह में शहीद भवन में नाटक धर्ममंगल का मंचन

 

By: hitesh sharma

Published: 30 Dec 2018, 08:09 AM IST

भोपाल। आदि विद्रोह नाट्य समारोह में शनिवार को नाटक धर्ममंगल का मंचन हुआ। नाटक बंगाल के मध्य युग के महाकाव्य धर्ममंगल पर बेस्ड है। इसमें रारह बंगाल में रहने वाली जनजातीयों से जुड़ी कहानी है। नाटक में बाउल म्यूजिक के माध्यम से कहानी को मंच पर उतारा गया। इसके साथ राई बैसे, रॉन पा, बहुरूपिया, घोड़ा नाच, ढाक नृत्य, ढोल नृत्य और काबु जैसे बंगाल के पारंपरिक नृत्यों को कहानी से जोड़ा गया। नाटक का यह 28वां शो है। दो घंटे के इस नाटक में 22 कलाकारों ने ऑनस्टेज अभिनय किया। नाटक का मंचन बांग्ला भाषा में किया गया।

नाटक की कहानी 6वीं शताब्दी के राज देवपाल से शुरू होती है। राजा देवपाल के बुजुर्ग हो जाने पर पत्नी का छोटा भाई महामोद राज्य की कमान संभाल लेता है। राजा लॉ सेन युद्ध जीतकर राजा बन जाता है। वह खुद सिंहासन पर बैठने की बजाए आम जनता को राजकाज से जोड़ लेता है। वह धर्म को सिंहासन पर बैठाकर धर्म राज्य की स्थापना करता है। इधर, महामोद राज्य का दुश्मन बन जाता है। वह बचपन में भी लॉ सेन की हत्या की असफल साजिश रच चुका होता है। लॉ सेन इतना बहादुर था कि वह बाघ को भी लड़ाई में पराजित कर देता है। एक दिन लॉ सेन के राजधानी पहुंचने पर महामोद अंगरक्षक सुरिक्खा के साथ मिलकर महामोद के धर्मपथ को भ्रष्ट करने की साजिश रचता है। वह असम के राजा कामरूप के साथ मिलकर युद्ध छेड़ देता है लेकिन जीत लॉ सेन की ही होती है। वह कामरूप को राज्य सौंप देता है। कामरूप अपनी बेटी कलिंगा का विवाह लॉसेन से कर देता है।

 

आम जनता की शासन में हो भागीदारी
डायरेक्टर का कहना है कि नाटक की कहानी आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि छठवीं शताब्दी में एक राजा ने शासन व्यवस्था को जनता से जोड़ा है। आज हमारे शासक चुनाव जीतकर जनता को ही भूल जाते हैं। यदि जनता खुद व्यवस्था से जुड़ा महसूस करे तो शायद देश ज्यादा तरक्की कर सकता है। व्यवस्था में जनजातीयों को शामिल ही नहीं किया जा रहा।

hitesh sharma Reporting
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