यहां पुरुष नहीं...महिलाएं देती हैं ट्रिपल तलाक

ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने महिलाओं को भले ही सुकून और सम्मान का अहसास दे दिया हो। लेकिन यहां मुस्लिम महिलाओं को भी है अधिकार...

By: sanjana kumar

Published: 22 Aug 2017, 01:09 PM IST

भोपाल। ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने महिलाओं को भले ही सुकून और सम्मान का अहसास दे दिया हो। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल ऐसा शहर है, जहां पति ट्रिपल तलाक कहकर रिश्ता तोडऩे के मामले नहीं, बल्कि शरिया कानून 'खुला' कहकर पत्नियों द्वारा तलाक के मामले ज्यादा सामने आए हैं।

ट्रिपल तलाक के मामले से ज्यादा दिलचस्प इस 'खुला' संबंधी ये फैक्ट काफी दिलचस्प बन पड़ा है, कि भोपाल में पिछले पांच साल में एक भी मुस्लिम पति ने तीन बार तलाक कहकर रिश्ता नहीं तोड़ा, वहीं मुस्लिम पत्नियों ने 'खुला' कदम उठाकर तलाक की अर्जियां शरिया कोर्ट में दाखिल कीं।

 

पहले जानें क्या है और कैसे बनी शरीयत?

कुरान में लिखे और अलिखित रीति-रिवाज शरीयत के तौर पर जाने जाते हैं। इस्लामिक समाज शरीयत के मुताबिक चलता है। इसके साथ ही शरीयत हदीस ( पैगंबर के काम और शब्द) पर भी आधारित है। मूल रूप से, वे समाज में व्यावहारिक समस्याओं के लिए बहुत व्यापक और सामान्य समाधान थे। दुनिया से उनका परदा करने के बाद (स्वर्ग सिधारना) कई धार्मिक संस्थानों और अपने न्यायिक व्यवस्था में शरीयत लागू करने वाले देशों ने समाज की जरूरतों के मुताबिक इन कानूनों की व्याख्या की और इन्हें विकसित किया। इस्लामिक लॉ की चार संस्थाएं हैं, जो कि कुरान की आयतों और इस्लामिक समाज के नियमों की अलग-अलग तरह से व्याख्या करते हैं। चार संस्थाएं (हनफिय्या, मलिकिय्या, शफिय्या और हनबलिय्या) चार अलग-अलग सदियों में विकसित हुई। मुस्लिम देशों ने अपने मुताबिक इन संस्थाओं के कानूनों को अपनाया। जबकि भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट साल 1937 में पास हुआ था। इसका उद्देश्य भारतीय मुस्लिमों के लिए एक इस्लामिक कानून कोड तैयार करना था। ताकि ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय मुस्लिमों पर उनके सांस्कृतिक नियमों के मुताबिक ही शासन करें। तब (1937) से मुस्लिमों के शादी, तलाक, विरासत और पारिवारिक विवादों के फैसले इस एक्ट के तहत ही होते हैं। एक्ट के मुताबिक व्यक्तिगत विवादों में सरकार दखल नहीं कर सकती।

ये है ट्रिपल तलाक

ट्रिपल तलाक का मतलब होता है कि कोई भी मुस्लिम पति अपनी पत्नी से सिर्फ तीन बार तलाक कहकर रिश्ता तोड़ सकता है।

 

क्या है खुला?

जिस तरह शरीयत कानून के मुताबिक मुस्लिम पति अपनी पत्नियों को तलाक देने के लिए तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कहकर रिश्ता तोड़ लेते हैं, ठीक उसी तरह मुस्लिम पत्नियां अपने तलाक लेने के लिए शरिया कोर्ट में 'खुला' (तलाक का आवेदन) दाखिल करती हैं।

शून्य हैं ट्रिपल तलाक के मामले

राजधानी भोपाल मप्र का ऐसा शहर है जहां पिछले चार-पांच साल में किसी भी शौहर ने अपनी पत्नी को तलाक, तलाक कहकर तलाक नहीं दी। यानी ट्रिपल तलाक कहकर रिश्ता खत्म करने वाले मामले यहां शून्य हैं। वहीं 'खुला' के जरिए पत्नियों द्वारा तलाक लेने के आंकड़े ज्यादा रहे।

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