scriptsuspended in corruption case, now again got a chic job | भ्रष्टाचार मामले में पहले हुए सस्पेंड अब फिर मिली ठाठ की नौकरी | Patrika News

भ्रष्टाचार मामले में पहले हुए सस्पेंड अब फिर मिली ठाठ की नौकरी

- बरसों निलंबित रहने के कारण अब बहाल किया

- सिस्टम की धीमी रफ्तार से नहीं पहुंच सके अंजाम तक

भोपाल

Published: July 12, 2022 12:21:19 pm

भोपाल। प्रदेश में भ्रष्टाचार करने वाले अफसर जांच की पेचीदगियों के कारण बच निकलते हैं। ऐसा ही हुआ है जनजातीय कार्य विभाग के आधा दर्जन से ज्यादा अफसरों के मामले में। भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों निलंबित रहने के बाद अब ये वापस नौकरी पर लौट आए हैं। यही नहीं अब कुछ ही दिनों में इनके ठाठ भी लौट आएंगे। जनजातीय कार्य विभाग ने इनकी बहाली के साथ नई पदस्थापना के आदेश भी दे दिए हैं। इन्हें लंबे समय तक निलंबित रहने के कारण बहाली दी गई है। इन अफसरों में आठ साल निलंबित रहने वाले भी हैं।

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दरअसल जनवरी 2013 में सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों को आदेश दिया था कि एक साल से ज्यादा निलंबित रहने वाले सरकारी अफसर-कर्मचारियों को बहाल किया जा सकता है। इसके लिए एक समिति गठित की गई। समिति ने 21 जनवरी 2022 को बैठक करके इनकी बहाली की सिफारिश कर दी। आधार बनाया वर्षों तक निलंबित रहना।

अफसर - कब से निलंबित - अब कहां पदस्थ?
प्रमोद चौहान - जून 2017 - सहायक संचालक शिक्षा कार्यालय सहायक आयुक्त बड़वानी (निलंबन के समय धार में पदस्थ थे)

मनोहर चौहान - अक्टूबर 2016 - कार्यालय सहायक आयुक्त जनजातीय कार्यालय रतलाम (निलंबन के समय उज्जैन में पदस्थ थे)

शकुंतला डामोर - दिसंबर 2018 - कार्यालय आयुक्त अनुसूचित जाति विकास भोपाल (निलंबन के समय इंदौर में पदस्थ थे)

कमलेश अवस्थी - मार्च 2018 - कार्यालय सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य मंडला (निलंबन के समय जबलपुर में पदस्थ थे)

केके सूर्येश - जून 2019 - कार्यालय सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य होशंगाबाद (निलंबन के समय जबलपुर में पदस्थ थे)

दिलीप डाले - सितंबर 2014 - कार्यालय सहायक आयुक्त जनजातीय कार्यालय सिवनी (निलंबन के समय छिंदवाड़ा में पदस्थ थे)

सतीश सिंह - फरवरी 2019 - सहायक संचालक शिक्षा कार्यालय सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य धार (निलंबन के समय इंदौर में)

चुनाव आयोग से लेनी पड़ी मंजूरी
सूबे में पंचायत व निकाय चुनाव होने के कारण सरकार बिना चुनाव आयोग की मंजूरी के इनकी पदस्थापना नहीं कर सकती। इस कारण बकायदा चुनाव आयोग से मंजूरी ली गई। चुनाव आयोग ने 2 जुलाई को मंजूरी दी, जिसके बाद 8 जुलाई को बहाली व पदस्थापना आदेश जारी कर दिए गए।

सिर्फ वित्तीय अधिकारों से दूर
इन अफसरों को अभी सिर्फ वित्तीय अधिकारों से दूर रखा गया है। बाकी पात्रता के हिसाब से सारे सरकारी ठाठ इनको मिलेंगे। इन्हें सहायक संचालक और सहायक कार्यालय आयुक्त तक के पद दिए गए हैं। स्थानीय स्तर पर ये पद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनके पास कार्यालय आयुक्त के सहायक संचालक के तौर पर पूरे प्रशासनिक अधिकार रहेंगे।

इतनी देरी क्यों?
दरअसल, इन अफसरों को लोकायुक्त व ईओडब्ल्यू के स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़ा गया था। इसके बाद विभाग ने इन्हें निलंबित कर दिया। इस निलंबन के बाद वर्षों जांच चलती रही। फिर मामला कोर्ट पहुंचा।

एक्सपर्ट व्यू : तय हो जांच की समय सीमा
सामान्य तौर पर जो अधिकारी-कर्मचारी भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ाते हैं, उनके प्रकरण के निपटारे के बाद ही बहाल करना चाहिए। लेकिन यदि कोर्ट के स्तर पर ही देरी हो रही है तो बहाली की जा सकती है। हालांकि ऐसा कम ही करना चाहिए। इसके अलावा विभागों के स्तर पर विभागीय जांच की भी टाइम लिमिट तय होनी चाहिए, ताकि एक निश्चित समय सीमा में जांच पूरी हो जाए। इससे निलंबन की अवधि ज्यादा नहीं होगी और प्रकरण का निपटारा जल्द हो सकेगा।
- एससी बेहार, पूर्व मुख्य सचिव, मप्र

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