मानवाधिकार आयोग ने कहा जब तक योजनाएं नहीं बनती तब तक हर पीडि़त को मिले 2 लाख मुआवजा

मानवाधिकार आयोग ने कहा जब तक योजनाएं नहीं बनती तब तक हर पीडि़त को मिले 2 लाख मुआवजा

Sumeet Pandey | Publish: May, 18 2019 06:02:01 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

कुत्तों का आतंक

भोपाल. शहर में आवारा कुत्तों के आतंक से मासूमों की जान जाने की भयंकर घटनाओं के बाद मानव अधिकार आयोग ने संज्ञान लिया है। अध्यक्ष नरेंद्र कुमार जैन ने इस मामले में राज्य सरकार से कई अनुशंसाएं की हैं। मानव अधिकार आयोग ने साफ किया है कि सरकार इन अनुशंसाओं को अपनी योजनाओं में समाहित कर नागरिकों की सुविधा का प्रबंध करे। उल्लेखनीय है कि शहर से कुत्तों को पकड़ कर नसबंदी करने के लिए नगर निगम से जुड़ी निजी फर्म ने भदभदा रोड से आगे साक्षी ढ़ाबा के पास रेस्क्यू सेंटर खोल रखा है। यहां पकड़कर लाए गए कुत्तों की सीएनवीआर पद्धति से नसबंदी की जाती है। कंपनी के पास कुत्तों को पकडऩे के लिए पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं लेकिन नियंत्रण के लिए मानव संसाधन पर्याप्त नहीं है। सिर्फ 25 कर्मचारियों के भरोसे सेंटर चलाया जा रहा है और इन्हीं पर शहर में कुत्तों को पकडऩे की जिम्मेदारी है। नगर निगम कॉल सेंटर के नंबर 0755-2701000 पर शिकायत आने पर सेंटर को सूचना दी जाती है जिसके बाद टीम संबंधित इलाके के लिए रवाना होती है।

ये है अनुशंसाएं
आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली मौत पर समिति बनाकर जांच कराई जाए और पीडित के परिवार को मुआवजा बांटें।
आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली मौत पर मुआवजा बढ़ाया जाए।
जब तक योजनाएं नहीं बनती तब तक पीडि़त को 2 लाख रुपए मुआवजा बांटा जाए।
स्वास्थ्य विभाग एवं कुत्तों को पकडऩे वाले अमले को संसाधन मुहैया कराएं ताकि खामी को दूर किया जा सके।

 

एक रिंग नेट के भरोसे पकड़ रहे शहर के कुत्ते
आपको जानकर हैरानी होगी कि नगर निगम की डॉग स्क्वायड एक रिंग नेट के भरोसे ही कुत्तों को पकड़ रही है। ये नेट भी काफी पुरानी हो चुकी है। बताया जा रहा है कि परंपरागत तरीके की ये नेट करीब दस किलो का वजन रखती है। इसे पकड़कर कुत्ते के साथ दौडऩा मुश्किल होता है। यही वजह है कि निगम की डॉग स्क्वायड को अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं। इतना ही नहीं, कुत्तों से खुद को बचाने या फिर तेजी से पकडऩे के लिए उनके पास कोई उपकरण ही नहीं है।

 

गौरतलब है कि तेज गर्मी में कुत्तों के हमले बढ़ गए हैं। निगम के हेल्पलाइन में ही रोजाना कम से कम 20 शिकायतें पहुंच रही है। निगम की डॉग स्क्वायड के कर्मचारी अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। स्थिति ये हैं कि रिंग के साथ स्क्वायड के सदस्य पहुंचते हैं तो कुत्ते भाग जाते हैं। अरेरा कॉलोनी ई-6 में भी एक कुत्ते को पकडऩे में चार कर्मचारियों को दो घंटे का समय लगा। चांदबड़ में कुत्ते पकड़े गए। इसमें तीन घंटे से अधिक समय लगा। निगम अमले ने हमीदिया अस्पताल के परिसर में आठ कुत्ते पकड़े। इन्होंने भी खूब छकाया। डॉग स्क्वायड प्रभारी राकेश शर्मा का कहना है कि भारी रिंग नेट से समय तो लगता है। यही वजह है कि कर्मचारी गंबूज जूतों के बगैर ही कुत्तों को पकड़ते हैं, जबकि ये अनिवार्य है।

 

इस तरह के उपकरण हो तो जल्द पकड़े जाएं कुत्ते
डॉग कैचर पोल- ये रेक्टेंगल आकार में प्लास्टिक की केबल से बना कुएं नुमा लूप उपकरण होता है। ये एल्यूमिनियम का लंबा पाइप से जुड़ा होता है। पाइप पर केबल इस तरह कसी होती है कि उससे लूप को कसा जा सकता है। इसका डायामीटर एक इंच से 11 इंच तक रहता है। यानि कुत्ते को इसमें फंसाकर तुरंत बंद किया जा सकता है।

कंट्रोल पोल- एक पाइप पर गोलाकार केबल होती है। इसे भी पाइप के अंतिम सीरे से कसा या ढीला किया जा सकता है। ये हल्की होती है। कुत्ते को इसमें फंसाकर पकड़ा जा सकता है।

 

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