scriptThe burden of files is decreasing from the table of babus, collectorat | बाबुओं की टेबल से कम हो रहा फाइलों का बोझ, डिजिटलाइजेशन की तरफ कलेक्टोरेट, 800 से 1000 नई फाइलें बनती हैं हर माह | Patrika News

बाबुओं की टेबल से कम हो रहा फाइलों का बोझ, डिजिटलाइजेशन की तरफ कलेक्टोरेट, 800 से 1000 नई फाइलें बनती हैं हर माह

- अनुमति शाखा, निर्वाचन शाखा, खाद्य शाखा, लायसेंस शाखा, भू अभिलेख शाखा, सामान्य निर्वाचन शाखा लोक, ई गवर्नेस शाखा, कलेक्टर से लेकर एडीएम कोर्ट और उनके दस्तावेज

भोपाल

Published: October 22, 2021 09:55:56 pm

भोपाल. कलेक्टोरेट में बाबुओं की टेबल पर अब दफ्तावेजी फाइलों का बोझ कम होता जा रहा है। अधिकांश शाखाओं का डिजिटलाइजेशन कार्य जारी है। अनुमति शाखा, निर्वाचन शाखा, खाद्य शाखा, लायसेंस शाखा, भू अभिलेख शाखा, ई गवर्नेंस व लोकसेवा गारंटी केंद्र डिजटलाइजेशन की तरफ बढ़ रहें हैं। काफी काम हो चुका है, पुराने कम्प्यूटर हटाकर नए लगा दिए गए हैं, कुछ जगह लगाए जा रहे हैं। धीरे-धीरे काम की रफ्तार भी तेज हो रही है। कुछ शाखाओं में 50 फीसदी तक काम पूरा हो गया है, उनमें किसी प्रकरण या केस की जानकारी के लिए अफसर को अब बाबुओं पर कम निर्भर रहना पड़ता है। अगर पूरी तरह डिजिटलाइजेशन हो गया तो यहां काम के लिए भटक रहे लोगों को ज्यादा परेशान नहीं होना होगा। केवल कलेक्टर कार्यालय में ही करीब 800 से 1000 नई फाइलें हर माह बनती हैं।

बाबुओं की टेबल से कम हो रहा फाइलों का बोझ, डिजिटलाइजेशन की तरफ कलेक्टोरेट, 800 से 1000 नई फाइलें बनती हैं हर माह
अनुमति शाखा, निर्वाचन शाखा, खाद्य शाखा, लायसेंस शाखा, भू अभिलेख शाखा, सामान्य निर्वाचन शाखा लोक, ई गवर्नेस शाखा, कलेक्टर से लेकर एडीएम कोर्ट और उनके दस्तावेज

इस कार्य की शुरूआत नवंबर 2020 में कलेक्टोरेट में वर्षों पुराने रिकॉर्ड को डिजिटलाइजेशन करने से की गई थी। इसमें नवाब काल में बनी एतिहासिक इमारतों से लेकर राजस्व सीमा के अंदर के खसरे, नक्शे, भू अर्जन, रेवेन्यू रिकॉर्ड, पुराने केस, जमीनों के अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज, सिंधी विस्थापन, तालाब विस्तार, शिफ्टिंग, नए निर्माण, किस विभाग को कहां जमीन दी गई। प्रशासन की तरफ से दी गईं लीज व अन्य सरकारी रिकॉर्ड को डिजिटलाइज किया जा रहा है। कलेक्टोरेट में रखे वर्षों पुराने रिकॉर्ड जिसे अब खोलकर देखने में भी पसीने छूट जाते थे। ऐसे रिकॉर्ड को डिजिटलाज कर हमेशा के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है। अभी एक जमीन के टुकड़े की स्थिति पता करने के लिए लेंड रिकॉर्ड या एसडीएम कार्यालय में रखे रिकॉर्ड से जानकारी मांगी जाती है। इसमें काफी समय भी लग जाता है। डिजिटलाइज होने से किसी भी जमीन, नवाब कालीन प्रॉपर्टी यहां तक की किस जमीन को लेकर कितना मुआवजा दिया गया, इसका रिकॉर्ड भी डिजिटलाइज किया जा रहा है। इनमें 30 साल पहले पेट्रोल पंप से लिए गए डीजल के सैम्पल की बोतलें तक के रिकॉर्ड को डिजिटलाइज किया है।

कलेक्टोरेट की छत पर रखा है बचा रिकॉर्ड
विभागों में वर्षों से हो रहे काम का एक-एक रिकॉर्ड संभाल कर रखा गया है। चाहे वो शस्त्र शाखा हो, कलेक्टर कोर्ट हो या फिर राजस्व से जुड़े मामले। इन रिकॉर्ड की इतनी अधिक संख्या हो गई कि उसे नीचे रखना मुश्किल हो गया। कलेक्टोरेट की छत पर टीन डालकर बस्तों में नंबरिंग कर रिकॉर्ड रखा गया है। कुछ महत्वपूर्ण रिकॉर्ड छत पर बने कमरे में रखा है। जिसमें कर्मचारी तैनात रहते हैं। इसमें से भी काफी रिकॉर्ड डिजिटलाइज हो गया है।

लेकिन ये समस्या भी है

जिस बाबू या कर्मचारी की टेबल पर कम्प्यूटर लगाना है या उसका लॉगइन बनाने के लिए कम से कम ईमेल की जरूरत पड़ती है। लेकिन कुछ बाबू अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। वे चाहते ही नहीं हैं कि उनकी शाखा डिजिटलाइज हो। ऐसे में कुछ बाबुओं की मनमर्जी के चलते कुछ शाखाओं में काम अटका भी है।

वर्जन
कलेक्टोरेट की शाखाओं का डिजिटलाइजेशन करने से काम और तेज होगा, लगातार इस काम को किया जा रहा है। इसके बाद बाकी दफ्तरों में नए कम्प्यूटर लगवाए जाएंगे।

अविनाश लवानिया, कलेक्टर

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