लालच और स्वार्थ का अंत हमेशा बुरा होता है

अभिनयन में हुआ नाटक 'करनी-भरनी' का मंंचन

 

By: hitesh sharma

Published: 19 Jan 2019, 09:39 AM IST

भोपाल। जनजातीय संग्रहालय में नवीन रंगप्रयोगों के प्रदर्शन की साप्ताहिक शृंखला अभिनयन में शुक्रवार को राजकुमार रायकवार के निर्देशन में नाटक 'करनी-भरनी' का मंचन संग्रहालय सभागार में हुआ। इस नाटक पृष्ठ भूमि गांव के जनजीवन पर आधारित है। इस नाटक के केंद्र में पन्नी और फुल्लो हैं। इनके पास एक भैंस है, जिसका नाम गोरी है। पन्नी और फुल्लो के साथ ही साथ गोरी(भैंस) गांवभर की चहेती भी है। गोरी की ख्याति गांव के लंबरदार व उसकी पत्नी कल्लो को बर्दाश्त नहीं होती, क्योंकि गोरी एक टाइम में 10 लीटर दूध देती है।

वहीं, लम्बरदार की 10 भैंसे मिलकर भी इतना दूध नहीं देती हैं। जहां पन्नी और उसकी पत्नी फुल्लो गोरी की सेवा करते हैं, देख-रेख करते हैं। उसकी साफ-सफाई कर उसे अ'छे से रखते हैं, वहीं लम्बरदार अपनी भैंस को अपने नौकरों के भरोसे छोडे हुए है। फलस्वरूप उसकी भैंसें पन्नी की एक भैंस के बराबर भी दूध नहीं दे पाती हैं। इसी वजह से लम्बरदार की पत्नी लम्बरदार को ताने मारती है, जिससे लम्बरदार पन्नी की भैंस के साथ अपनी भैंस को भी चरने जंगल भेजता है, फिर भी भैंसों के दूध में कोई बढ़ोत्तरी नहीं होती।

भैंस को मार देता है लम्बरदार
अंतत: लम्बरदार अपनी पत्नी के तानों से तंग आकर पन्नी की भैंस को मार डालता है। फुल्लो के कहने पर पन्नी अपनी मरी भैंस का चमड़ा लेकर बाजार में बेचने जाता है, लेकिन चमड़ा नहीं बिकता और वह घर की ओर निराश होकर चल देता है। रस्ते में उसे डाकुओं का धन मिल जाता है। पन्नी वह धन लेकर घर पहुंचता है तो गांव के लोगों को और लम्बरदार को लगता है कि चमड़ा बेचने के कारण ही पन्नी को इतना धन मिला है। अंतत: लम्बरदार अपनी सभी भैंसों को मार देता है और अंत में वह अपने कृत्य से बहुत शर्मिंदा होता है और इसी के साथ नाटक का अंत होता है।

hitesh sharma Reporting
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