जिन गजलों का विरोध हुआ वे ही पहचान बनीं

जिन गजलों का विरोध हुआ वे ही पहचान बनीं

hitesh sharma | Publish: Sep, 03 2018 09:53:27 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

दुष्यंत कुमार व हबीब तनवीर की जयंती और बव कारंत की पुण्यतिथि...

भोपाल। गजलों को उर्दू जुबान और प्यार-मोहब्बत की शायरी कहा जाता है। दुष्यंत कुमार ने उर्दू रवानियत के साथ हिन्दी में गजलें लिखना शुरू कीं। गजलकारों ने इसका विरोध भी किया।

वे अक्सर कहते थे कि इसे गजल कहना ही गलत होगा। दुष्यंत ने राजनीतिक हालातों और आम जन के दर्द को गजलों में उतारा। जनता ने भी इसे खूब पसंद किया और आज भी लोग याद करते हैं।

आज दुष्यंत कुमार की जयंती है। इस अवसर पर पत्रिका प्लस उनसे जुड़े छुए-अनछुए पहलुओं को शेयर कर रहा है। दुष्यंत को वैसे तो एक गजलकार के रूप में जाना जाता है, लेकिन वे एक गीतकार और गायक भी थे। इलाहाबाद में रहते हुए उनकी ख्याति गीतकार के रूप में ही थी। इसके बाद उन्होंने उपन्यास, कविता संग्रह और काव्य नाटक भी लिखे।

alok tyagi

1. कैसे आकाश में सुराख
नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से
उछालो यारो।

2. घर की हर दीवार पर
चिपके हैं इतने इश्तिहार,
अब किसी भी नजर
आती नहीं कोई दरार।

3. अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

narendra

उपनाम का कर दिया त्याग

दुष्यंत कुमार का पूरा नाम दुष्यंत नारायण सिंह त्यागी था। बाद में दुष्यंत नारायण सिंह त्यागी 'विकल' लिखने लगे। कुछ सालों बाद वे नाम के साथ परदेसी लिखने लगे। उन्हें एहसास हुआ कि उपनाम से जाति बंधन का बोध होता है, तो उन्होंने सिर्फ दुष्यंत कुमार लिखना शुरू कर दिया।

rajurkar

शायरी इतनी पसंद कि घर को संग्रहालय बना दिया
30 दिसंबर 1978 को दुष्यंत जी का देहांत हुआ। उनसे कभी मुलाकात नहीं हो पाई। अक्सर उनकी शायरी पढ़ता था। वो मुझे इतनी पसंद आईं कि मैंने उनकी याद में संग्रहालय बनाने का निर्णय लिया। उस वक्त मेरे पास उनसे जुड़े चंद ही पत्र थे। उनके परिवार व अन्य मित्रों ने मुझे धरोहर सौंपी। अभी संग्रहालय में उनकी 6 पांडुलिपी, 11 किताबें व कई पत्र मौजूद हैं।
- राजुरकर राज, निदेशक, दुष्यंत संग्रहालय


पिता ने समझाई अपने अधिकार की कीमत
कॉलेज के दिनों में हमारे एक प्रोफेसर का ट्रांसफर हुआ तो स्टूडेंट्स ने आवाज उठाई। मैनेजमेंट ने पापा से कहा कि आपके बेटे के खिलाफ कार्रवाई होगी। तो वो बोले कि वह गलत काम नहीं कर रहा है, लेकिन मैं ये भी नहीं कहूंगा कि आप कार्रवाई न करें। उसे ये पता होना चाहिए कि अपने अधिकार पाने के लिए कीमत चुकाना पड़ती है। यह मेरे लिए सबसे बड़ी सीख है
- आलोक त्यागी, दुष्यंत कुमार के पुत्र


कॉलेज में मंच कवि के रूप में ख्यात थे
मेरा उनसे 1960 में परिचय हुआ। उन दिनों वे आकाशवाणी में असिस्टेंट प्रोड्यूसर थे। उनके लिखे गीत मुझे बहुत पसंद थे। मैं उनके टीटी नगर स्थित घर पर शाम को जाता था। वे मुझे अपने गीत सुनाते। उन्होंने पहली बार मुझे पहले से समझाती दुनिया, तब तो मन वश में कर लेते, लेकिन अब तो प्यार हमारा, बंधन से आगे जा पहुंचा... गीत सुनाया था।

- नरेन्द्र दीपक, साहित्यकार

bv karant

ब.व. कारंत : थिएटर की हर विधा के एक्सपर्ट थे
शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी कमल जैन बताते हैं कि थिएटर में ब.व. कारंत जैसा आज तक कोई नहीं हुआ और मुश्किल है भविष्य में भी कोई हो। यह बात मैं कह सकता हूं क्योंकि मुझे उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला है।

मैंने उनके साथ नाटक महानिर्वाण में काम किया है जिसे अलखनंदन के निर्देशन में तैयार किया गया था। वे उस नाटक में मुख्य किरदार में थे। इसी नाटक में उन्होंने बेटे के किरदार के लिए मेरा चुनाव किया था। स्टेज पर उनके साथ बिताया वो पल मेरे लिया जीवनभर की अनूठी याद है। यह इसलिए भी खास है क्योंकि ये एकमात्र नाटक था जिसमें उन्होंने एक्टिंग की थी।

उनसे मैंने अनुशासन सीखा और जाना कि सहज और सरल इंसान क्या होता है। किसी भी व्यक्ति के लिए टाइम डिसिप्लिन को जीवन में फॉलो करना शायद सबसे कठिन हो, पर उन्हें इसमें महारत थी। इसी कारण वे सभी विधाओं के एक्सपर्ट थे। कम ही लोग जानते होंगे कि वे म्यूजिशियन भी थे, उन्हें संगीत बनाने के लिए वाद्यों की जरूरत नहीं पड़ती थी, वे तो पत्थर, कागज लकड़ी किसी भी चीज से संगीत बना सकते थे।

kamal jain

हबीब तनवीर : वो अनपढ़ को भी रटवा देते थे डायलॉग
ह बीब तनवीर के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे जाने माने एक्टर और वरिष्ठ रंगकर्मी बालेन्द्र सिंह बालू बताते हैं कि मैं उनके साथ वर्ष 1996 में अगस्त के माह में जुड़ा था। तब तक मैं खुद को बड़ा एक्टर मानता था, पर उनके साथ रहते हुए मुझे पता चला कि वाकई अभिनय क्या है। वे उस दौरान प्रसिद्ध नाटक जिन लाहौर नहीं वो देख्या जमया ही नहीं को तैयार कर रहे थे।

मैं तब सीख ही रहा था कि उन्होंने मुझे नाटक में एक महत्वपूर्ण किरदार दे दिया। यह जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी और इसके बाद ही मुझे देशभर में पहचान मिली व मेरा एक्टिंग को लेकर कॉन्फीडेंस वापस आया। हबीब तनवीर ऐसे निर्देशक थे जो अनपढ़ कलाकारों से भी काम निकलवा लेते थे।

जो पढऩा नहीं जानते, लिखना नहीं जानते, वे उन्हें बोल बोल कर ही डायलॉग याद करवा देते थे और ये डायलॉग लोग जिंदगीभर नहीं भूलते थे। उनकी क्रिएटिविटी का ही कमाल था कि नाटक चरणदास चोर विश्वभर में विख्यात हुआ। उन्होंने ऊर्दू शायरी पर भी नाटक बनाया। एक्सपेरिमेंट्स को लेकर उनके अंदर एक अलग जुनून था।

balendra
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