घाटे का तिलिस्म : बिजली में मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की..

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- घाटा कम होने की बजाए बढ़ता जा रहा
- घाटे के कारण ही बिजली हो रही महंगी
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[email protected]भोपाल। प्रदेश में बिजली कंपनियों ने घाटे का तिलिस्म ऐसा रचा है कि इसे खत्म करने का हर प्रयास फेल साबित हो रहा है। 2003 में घाटे को खत्म करने के उद्देश्य से ही बिजली बोर्ड को भंग करके बिजली कंपनियों का गठन किया गया था, लेकिन बिजली कंपनियों ने घाटा कम करने की बजाए और बढ़ा दिया। औसतन हर साल तीन से चार हजार करोड़ घाटे का टैरिफ प्रस्ताव बिजली कंपनियां देती है। इस आमदनी और खर्च के बीच का घाटा सरकार की 21 हजार करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी और सालाना छह हजार करोड़ से ज्यादा के कर्ज के बावजूद खत्म नहीं होता। यहां तक की केंद्र सरकार की बिजली कंपनियों को आत्मनिर्भर करने की योजना में हजारों करोड़ लेने के बावजूद घाटे का गणित पूरा नहीं हुआ। इस दौरान एक बार फिर बिजली कंपनियों को भंग करके बिजली बोर्ड बनाने की मांग उठी है। इस बिंदु सहित बिजली की अन्य समस्याओं पर मंत्री समूह मंथन कर रहा है, लेकिन सरकार को फिलहाल बिजली के घाटे को खत्म करने की राह नजर नहीं आ रही है। पढि़ए, विशेष रिपोर्ट..
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यूं बढ़ता गया घाटा-
बिजली के घाटे को कम करने के जितने जतन और दावे किए गए, उतना ही घाटा बढ़ता गया। वर्ष-2000 में विघुत मंडल के समय घाटा 2100 करोड़ और दीर्घकालीन कर्ज करीब 4892.6 करोड़ दर्ज था। वहीं 2014-15 में घाटा 30 हजार 282 करोड़ और दीर्घकालीन कर्ज बढक़र 34 हजार 739 करोड़ पार हो गया। वहीं अब वर्ष-2020 की स्थिति में 40 हजार करोड़ से ज्यादा का कुल घाटा हो चुका है। बिजली कंपनियों ने अपने ट्रू-अप प्लान में ही 26 हजार करोड़ से ज्यादा का घाटा बताया है।
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सरकार अलग कर्जदार हुई-
बिजली कंपनियों के घाटे की भरपाई के चक्कर में सरकार अलग कर्जदार हो गई है। सरकार ही बिजली कंपनियों को 21 हजार करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी देती है, जिसे कम करने के लिए अब उपाय खोजे जा रहे हैं। उस पर हद ये कि चार साल पूर्व सरकार बिजली कंपनियों का करीब 26 हजार करोड़ का घाटा केंद्र सरकार की योजना के तहत खुद पर ओढ़ चुकी है। इसके बावजूद हर साल औसत छह हजार करोड़ के कर्ज की गारंटी सरकार बिजली कंपनियों को देती है। इससे सरकार की माली हालत अलग खराब हो रही है।

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2003 से अब तक यूं रहा घाटे का सफर-
घाटे के कारण ही बिजली बोर्ड को भंग करके बिजली कंपनियां बना दी गई। इनमें तीन बिजली वितरण कंपनियां रखी गई। विद्युत अधिनियम 2003 भी लागू किया गया। इसके तहत राज्य विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों के लिए सालाना घाटे का पैमाना भी तय किया, लेकिन हर साल बिजली कंपनियां इससे पार चली जाती। लाइन लॉस से लेकर पीएलएफ तक के नुकसान के मापदंड आयोग ने तय किए, किंतु कंपनियों ने हमेशा बैलेंस शीट में ज्यादा घाटा बताया। नुकसान काबू में नहीं करने के कारण बिजली कंपनियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन नियामक आयोग उदार बना रहा। नियामक आयोग ने कई बार नुकसान को काबू न करने पर बिजली कंपनियों को फटकार लगाई, लेकिन कार्रवाई कभी नहीं की।
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कमलनाथ व शिवराज सरकार में वापस बिजली बोर्ड बनाने की मांग-
बिजली कंपनियों को भंग करके वापस बिजली बोर्ड का गठन करने की मांग हाल ही में दो बार उठ चुकी है। 2019 में कमलनाथ सरकार के समय इसकी मांग उठी थी। तब, फ्रांस की कंपनी से समझौता करके बिजली व्यवस्था को रिफार्म करना तय किया गया था। इसके बाद फ्रांस की कंपनी ने बिजली के लिए अलग से एक मानीटरिंग बॉडी गठित करने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद कमलनाथ सरकार गिर गई, तो यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। हाल ही में वापस लोक निर्माण मंत्री गोपाल भार्गव ने ऊर्जा विभाग के प्रेजेंटेशन के दौरान बिजली कंपनियों को खत्म करके वापस बोर्ड गठित करने पर विचार करने का सुझाव दिया था। इसके बाद सीएम शिवराज सिंह चौहान ने मंत्रियों का समूह बनाकर बिजली व्यवस्था की समस्याओं को दूर करने के निर्देश दिए। यह समूह अभी बैठकों में उलझा है।
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बिजली कंपनियों का घाटा- (ट्रू-अप प्लान के मुताबिक)
वर्ष- राशि
2014- 15 में 5156.88 करोड़ रुपए
2015-16 में 7156. 94 करोड़ रुपए
2016- 17 में 7247.55 करोड़ रुपए
2017-18 में 5327.54 करोड़ रुपए
2018-19 में 7053.00 करोड़ रुपए
2020-21 में 2000 करोड़ लगभग बताया
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घाटे के गणित ने बिजली यूं की महंगी-
वर्ष- दर वृद्धि (प्रतिशत में)
2010-11 - 10.65
2011-12 - 6.14
2012-13 -7.17
2013-14 - 0.77
2014-15 - 00
2015-16 - 9.83
2016-17 - 8.39
2017-18 - 9.98
2018-19 - 00
2019-20 - 7.0
2020-21 -1.98
2021-22 - 0.63
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जीतेन्द्र चौरसिया Reporting
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