Holi 2018: दुनिया भर में प्रसिद्ध है कुमाऊं की होली,यहां महिलाएं करती हैं बैठकी तो पुरुष गाते हैं फाग

Holi 2018: दुनिया भर में प्रसिद्ध है कुमाऊं की होली,यहां महिलाएं करती हैं बैठकी तो पुरुष गाते हैं फाग

Deepesh Tiwari | Publish: Feb, 27 2018 01:47:15 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

भोपाल में रच बस गए इस समाज के लोगों ने यहां रहने के बावजूद अपनी सांस्कृतिक परंपरा को नहीं छोड़ा है।

भोपाल। अभी कुछ ही दिनों में होली का त्योहार आने वाला है। इस बार होली 1 मार्च की है वहीं दुल्हेंडी 2 मार्च की रहेगी। वैसे तो देश भर में बरसाने की होली काफी प्रसिद्ध है, लेकिन क्या आप जानते हैं कुमाऊं की होली को भी अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए पूरे देश में जाना जाता है और ऐसा भी नहीं की ये होली केवल उत्तरांचल तक ही सीमित रह गई हो।

बल्कि अब तो इस समाज के जो लोग अन्य जगहों पर बस गए हैं वे भी इसे अपने तौर तरीकों से ही मनाते हैं। इसी के चलते भोपाल के भी कुछ ऐसे क्षेत्रों में इस होली की धूम देखने को आसानी से मिल जाती है जहां कुमाऊंनी लोग बहुतायत में बसे हुए हैं।

दरअसल भोपाल में भी इसी समाज के कई परिवार लंबे समय से रच बस गए हैं, यहां आने के बावजूद इन्होंने अपनी सांस्कृतिक परंपरा को नहीं छोड़ा है। थोड़ा बहुत बदलाव के बाद इस समाज के लोग शहर के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी अपनी परंपरा के अनुसार होली का त्योहार मनाते हैं।

इसके तहत महिलाएं होली के दिन बैठकी का आयोजन करती हैं जिसमें अधिकांशत: समाज के लोग ही हिस्सा लेते हैं। भोपाल के कोलार क्षेत्र में रहने वाले कुमाउनी के अलावा अन्य कई कॉलोनियों में जहां ये बहुतायत में हैं इनका आयोजन होता है। इस दौरान यहां होली का गायन शास्त्रीय धुन पर आधारित रहता है।

यह है पूरी परंपरा
होली का त्यौहार रंगों का त्यौहार है, धूम का त्यौहार है, लेकिन उत्तराखण्ड के कुमाऊं मण्डल में होली रंगो के साथ-साथ रागों के संगम का त्यौहार है। इसे अनूठी होली कहना भी गलत नहीं होगी, क्योंकि यहां होली सिर्फ रंगो से ही नहीं, बल्कि रागों से भी खेली जाती है।

पौष माह के पहले सप्ताह से ही और वसंत पंचमी के दिन से ही गांवों में बैठकी होली का दौर शुरु हो जाता है। इस रंग में सिर्फ अबीर गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है।

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होल्यार हारमोनियम, तबला और हुड़के की थाप पर भक्तिमय होलियों से बैठकी होली शुरु करते हैं। इन होलियों को शास्त्रीय रागों पर गाया जाता है, जिनमें दादरा और ठुमरी ज्यादा प्रचलित है।

अधिकतर बैठकी होलियों में राग धमार से होली का आह्वान किया जाता है तथा राग श्याम कल्याण से होली की शुरुआत की जाती है, बीच में समयानुसार अन्य रागों पर आधारित होलियां गाई जाती हैं और इसका समापन राग भैरवी से किया जाता है। इसके अतिरिक्त महिलाओं की बैठकी होली भी बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें महिलाओं के स्वभावानुसार श्रॄंगार रस की अधिकता होती है।

बैठकी होली कुमाऊं के लोक संगीत में रची बसी होने के बाद भी इसकी भाषा ब्रज की है, सभी बंदिशें राग-रागिनियों पर गाई जाती हैं। यह खांटी शास्त्रीय गायन तो है, लेकिन इसे गाने का ढब भी थोड़ा अलग है। क्योंकि इसे समूह में गाया जाता है, लेकिन इसे सामूहिक गायन भी नहीं कहा जा सकता और न ही शास्त्रीय होली की तरह एकल गायन। महफिल में बैठा कोई भी व्यक्ति बंदिश गा सकता है, जिसे भाग लगाना कहा जाता है।

यानि बैठकी होली में शामिल हर व्यक्ति श्रोता भी खुद है और होल्यार भी खुद है। बैठकी होली पौष माह के प्रारम्भ से शुरु हो जाती हैे।

कुमाँऊ में हो या वहां से बाहर होलियार होली की शुरूआत ज्यादातर जिस होली से करते हैं वो है 'सिद्धि को दाता, विघ्न विनाशन, होली खेलें गिरिजापति नंदन'।

वहीं इसके अलावा-
जल कैसे भरूं जमुना गहरी -2
ठाडी भरूं राजा राम जी देखें
बैठी भरूं भीजे चुनरी
जल कैसे...
जैसे गीत गाए जाते हैं जिनके स्वर अचानक ऊपर व नीचे आ जाते हैं।

ऐसे समझें कुमाऊंनी होली...
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध एवं सजग माने जाने वाले अल्मोड़ा में तो सांझ ढलते ही होल्यारों की महफिलें सज जाती हैं। इसमें हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। युवक, युवतियों और वृद्ध सभी को होली के गूंजते गानों में सराबोर देखा जा सकता है।

लगभग यही दशा कुमाऊं मंडल के अधिकांश क्षेत्रों की होती है। नैनीताल और चंपावत में तबले की थाप, मंजीरे की खनखन और हारमोनियम के मधुर सुरों पर जब 'ऐसे चटक रंग डारो कन्हैया' गाते हैं, तो सभी झूम उठते हैं।

तिहाई पूरा होते ही लगता है कि राग-विहाग की ख़ूबसूरत बंदिश ख़त्म हो गई है, लेकिन तभी होली में भाग लगाने वाले होल्यारों के मुक्त कंठ से भाग लगाते ही तबले पर चांचर का ठेका अभी शुरू नहीं हुआ कि 'होरी' फिर से शबाब पर लौट आती है।

बैठकी होली की उमंग...
यह खासतौर से कद्रदान और कलाकार दोनों का मंच है। कहा जाता है कि इस लोक विधा ने हिन्दुस्तानी संगीत को समृद्ध करने के साथ-साथ एक नई समझ भी दी है।

कुमाऊंनी होली के मुख्या दो रूप प्रचलित हैं-बैठकी होली और खड़ी होली।

बैठकी होली यहां पौष माह से शुरू होकर फाल्गुन तक गाई जाती है। पौष से बसंत पंचमी तक अध्यात्मिक बसंत, पंचमी से शिवरात्रि तक अर्ध श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस में डूबी होलियाँ गाई जाती हैं। इनमें भक्ति, वैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियों की हंसी-ठिठोली, प्रेमी प्रेमिका की अनबन, देवर-भाभी की छेड़छाड़ सभी रस मिलते हैं।

इस होली में वात्सल्य, श्रृंगार, भक्ति रस एक साथ मौजूद हैं।

होली के अवसर पर गीत-संगीत की सजती महफ़िल...
खड़ी होली दिन में ढोल-मंजीरों के साथ गोल घेरे में पग संचालन और भाव प्रदर्शन के साथ गाई जाती है। तो रात में यही होली बैठकर गाई जाती है।

शिवरात्रि से होलिकाअष्टमी तक बिना रंग के ही होली गाई जाती है। होलिका अष्टमी को मंदिरों में आंवला एकादशी को गांव मोहल्ले के निर्धारित स्थान पर चीर बंधन होता है और रंग डाला जाता है।

कहा जाता है किे आधुनिक दौर में जब परंपरागत संस्कृति का क्षय हो रहा है तो वहीं कुमाऊं अंचल की होली में मौजूद परंपरा और शास्त्रीय राग-रागनियों में डूबी होली को आमजन की होली बनता देख सुकून दिलाता है। होली का त्यौहार रंगों का त्यौहार है,धूम का त्यौहार है। लेकिन उत्तराखण्ड के कुमाऊं मण्डल में होली रंगो के साथ-साथ रागों के संगम का त्यौहार है।

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