लोकरंग में इस बार 110 ही स्टॉल आवंटित किए, बनीं विवाद की स्थिति

कलाकार खुलकर संस्कृति विभाग के अफसरों का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे

By: Radhyshyam dangi

Updated: 19 Jan 2019, 11:54 AM IST

भोपाल. संस्कृति विभाग द्वारा प्रतिष्ठित लोकरंग कार्यक्रम इस बार विवादों में फंसता नजर आ रहा है। २६ से ३० जनवरी तक भेल दशहरा मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में इस साल महज ११० ही अरण्य क्षेत्रों और ग्रामीण अंचलों के परंपरागत लोक कलाकारों को ही स्टॉल आवंटित किए गए है। इसके कारण कलाकारों में आक्रोश नजर आ रहा है।

संस्कृति विभाग अब तक के सभी कार्यक्रमों में ४०० से अधिक स्टॉल आवंटित कर कलाकारों को महत्व देते आया है, लेकिन इस बार सैकड़ों कलाकारों को उपेक्षित कर दिया गया है। संस्कृति विभाग का तर्क है कि चंद कलाकार ही होते हैं जो गौहर महल, भोपाल हाट आदि में स्टॉल लगा रहे हैं, इसलिए लोकरंग में इस बार स्क्रूटनी कर वास्तविक परंपरागत कलाकारों को ही स्टॉल आवंटित किए गए हैं।

जबकि पिछले सालों के हर आयोजन में ३०० से अधिक कलाकारों को यहां मौका दिया गया। इस बार अचानक इनकी संख्या घटाकर महज ११० कर दी गई। इससे प्रदेश और अन्य राज्यों के कई नामचीन और ख्यातिप्राप्त लोगों को लोकरंग में स्टॉल नहीं मिल पाया है। इसके कारण कई कलाकारों ने आक्रोश भी जाहिर किया है। लेकिन कार्रवाई के भय से कोई कलाकार खुलकर संस्कृति विभाग के अफसरों का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

 

 

राजधानी में गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर ३३ साल से लोकरंग आयोजित हो रहा है। इस साल ३४वां आयोजन होगा। इसमें लोक संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक एकता के अनेक रंग देखने को मिलते हैं। संस्कृति के विभिन्न पाठ यहां सीखने को मिलते हैं।

मप्र सहित अन्य प्रांतों के लोक व्यवसायी अपने-अपने क्षेत्र की स्थानीय कला इस आयोजन के जरिए लोगों तक पहुंचाने आते हैं। लेकिन इस बार इनकी संख्या कम करने से अधिकांश लोक-परंपरागत व्यवसायियों को मायूस होना पड़ा। यह एेसे कलाकार है जिनकी जीविका भी इसी तरह के आयोजनों के व्यवसायी पर टीकी होती है, लेकिन राज्य शासन ने पहली बार इस तरह का निर्णय लिया है, जिसके कारण इन्हें लोकरंग में जगह नहीं मिल पा रही।

 

कई आयोजन इस दौरान हो रहे हैं। परंपरागत लोगों की संख्या सीमित है। एक ही कलाकार गौहर महल, भोपाल हाट सहित कई आयोजनों में स्टॉल लगाता है। बार-बार एक ही कलाकार हर जगह होता है, इसलिए इस बार स्टॉल की संख्या घटा दी गई है।

अशोक मिश्रा, आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी संस्कृति विभाग

Radhyshyam dangi Reporting
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