Love Story: हार गए थे सम्राट अशोक, जब मिले थे विदिशा की सुंदरी से नैन

अपने युद्ध कौशल से दुनिया को जीतने वाले सम्राट अशोक विदिशा में अपना दिल हार बैठे थे। यहां की एक सुंदर लड़की से पहली नजर में प्यार कर बैठे थे। यहीं के बाग-बगीचों और नदी किनारे उन्होंने प्रेम की बातें की थीं...। 

Valentine Day Special Story

(अपने युद्ध कौशल से दुनिया को जीतने वाले सम्राट अशोक विदिशा में अपना दिल हार बैठे थे। यहां की एक सुंदर लड़की से पहली नजर में प्यार कर बैठे थे। यहीं के बाग-बगीचों और नदी किनारे उन्होंने प्रेम की बातें की थीं...। वेलेंटाइन-डे पर mp.patrika.com में पढ़ें सम्राट अशोक की प्रेम कहानी...)


गोविन्द सक्सेना.भोपाल
दुनियाभर में अपने युद्ध कौशल और बहादुरी का लोहा मनवाने वाले सम्राट अशोक विदिशा (तत्कालीन बैसनगर) में अपना दिल हार बैठे थे। वे जब भोपाल के पास स्थित विदिशा आए तो वे करीब 20 साल के थे, तब यहां की नवयौवना शाक्यवंशी साहूकार की बेटी देवी से उनके नैन मिल गए और पहली ही नजर में वे अपना दिल हार बैठे।

विदिशा के बाग-बगीचे, गलियां और नदियों के किनारे अशोक और देवी के प्रणय स्थली बने। यहीं अशोक ने देवी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और विदिशा की देवी हो गईं अशोका द ग्रेट की। इस तरह विदिशा सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र तथा बिन्दुसार के बेटे सम्राट अशोक की ससुराल भी रही है। यही कारण है कि आज भी विदिशा में आगमन के समय कई बार सुनने को मिलता है कि-सम्राट अशोक की ससुराल में आपका स्वागत है।



देवी ने अशोक से लिया था वचन
युवराज अशोक को उनके पिता बिन्दुसार ने 18 वर्ष की आयु में उज्जैन का राजप्रतिनिधि नियुक्त किया था। कुछ समय बाद ही पाटलिपुत्र से उज्जैन जाते समय युवराज अशोक विदिशा (बैसनगर) में रुके थे। यहां से गुजरते समय उनकी नजर देवी पर पड़ी और फिर अशोक ने देवी से मेलजोल बढ़ाया।

अशोक के प्रस्ताव पर देवी ने उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उन्होंने अपने पति अशोक से आजीवन विदिशा में ही रहने का वचन ले लिया। अशोक ने उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए वचन दिया और दोनों ने उसे निभाया भी। देवी कभी पाटलिपुत्र नहीं गईं। बाद में अशोक सम्राट बने, लेकिन देवी ने अपना वचन नहीं तोड़ा, सम्राट की रानी होते हुए भी उन्होंने विदिशा में ही जीवन बिताया।



बुद्ध की अनुयायी थीं देवी
सम्राट अशोक और देवी के एक पुत्र महेन्द्र और एक पुत्री संघमित्रा हुए। देवी भगवान बुद्ध की अनुयायी थीं। महेन्द्र और संघमित्रा भी बुद्ध की अनन्य भक्त थीं। अशोक अपने दोनों बच्चों को पाटलिपुत्र ले गए लेकिन संघमित्रा यहीं रहीं। सम्राट अशोक के शासनकाल के तीसवें वर्ष 239 ईसा पूर्व में विदिशा में ही देवी की मृत्यु हो गई।




श्रीलंका जाने से पूर्व मां से मिली थी संघमित्रा
सम्राट अशोक और देवी के साथ ही उनके बच्चों महेन्द्र और संघमित्रा का नाम भी इतिहास में अमर है। महेन्द्र के साथ-साथ संघमित्रा ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। जब एक बार महेन्द्र बौद्ध धर्म का प्रचार करने श्रीलंका गए तो वहां की रानी अनुला ने संसार से विरक्त होकर बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने की इच्छा जताई। लेकिन महेन्द्र ने वहां के राजा को समझाया कि नियमानुसार कोई पुरुष भिक्षु महिला को दीक्षित नहीं कर सकता। तब इस कार्य के लिए भारत से महाविदुषी संघमित्रा को बुलवाया गया और बोधिवृक्ष की शाखा सहित संघमित्रा को श्रीलंका भेजने की तैयारी हुई।



सम्राट अशोक ने अपनी पुत्री को विदा कर दिया। भिक्षु-भिक्षुणियों के साथ संघमित्रा तपस्विनी वेष में पाटलिपुत्र से अपनी मां के नगर विदिशा पहुंची। यहां देवी और संघमित्रा का अंतिम मिलन हुआ। देवी ने वेदिसगिरी(विदिशा के पास सांची की पहाड़ी) पर संघमित्रा का अंतिम अभिवादन किया।

संघमित्रा बोधिवृक्ष के साथ संघमित्रा पहुंची और रानी अनुला समेत करीब 1 हजार महिलाओं को वहां दीक्षित किया। दोनों भाई-बहन जीवन पर्यन्त लंकावासियों को भगवान बुद्ध का संदेश सुनाते रहे। वे भारत से एक बार गए तो फिर वापस नहीं लौटे।

(इतिहास के पन्नों से वेलेंटाइन डे के मौके पर जारी यह सीरिज...।)

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