तीन पीढिय़ों ने दिखाया कारंत का जीवन

तीन पीढिय़ों ने दिखाया कारंत का जीवन

hitesh sharma | Publish: Sep, 06 2018 05:06:02 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

भारत भवन में 'आदरांजलि' के अंतर्गत 'रंगजंगम' का मंचन

 

भोपाल। भारत भवन में चल रहे 'आदरांजलि' नाट्य समारोह में कन्नड़ नाटक 'रंगजंगम' का मंचन हुआ। एक घंटे बीस मिनट के इस नाटक में 17 कलाकारों ने अभिनय किया। इस नाटक की खास बात यह है कि इसके डायरेक्टर और प्रमुख कलाकार बव कारंत के शिष्य हैं, जिन्होंने मैसूर स्थित रंगायन रेपर्टरी में उनसे अभिनय करना सीखा था। वहीं अन्य कलाकार शिष्यों के शिष्य व नवोदित कलाकार हैं। नाटक में कारंत की नाटक करने की विभिन्न शैलियों को कन्नड़ भाषा में प्रस्तुति किया। नाटक के माध्यम से तीन पीढिय़ों ने उन्हें शृंद्धाजंलि दी। नाटक के लेखक और निर्देशक एस रामनाथ हैं। नाटक का उद्देश्य निर्देशन, कैरेक्टर पर काम, रंगसंगीत के माध्यम से और रंगशिक्षक के रूप में उनके विचारों को प्रस्तुत करना है।

कारंत के शो की तरह साधारण सेट

डायरेक्टर ने सेट को बहुत ही साधारण तरीके से पेश किया। लड़की की फ्रेम पर बंधी साडिय़ों और मुखौटों के जरिए कहानी को बयां किया गया। डायरेक्टर का कहना था कि कारंत ने उन्हें सीखाया है कि सेट की भव्यता से ज्यादा कहानी और एक्टिंग में जान होना जरूरी है। सेट हमेशा उतना ही यूज करो, जितनी जरूरत हो। नाटक में दिखाया गया कि कैसे कारंत कैरेक्टर पर काम करते थे, कैसे म्यूजिक देते थे और कैसे वह निर्देशन करते। नाटक की शुरुआत शिवजी के नृत्य 'अंगिकम भुवनं यस्या...' से होती है। वहीं एक दृश्य ग्रीम रूम का भी रखा गया। जिसमें दिखाया गया कि कैसे कारंत ग्रीन रूम में सभी कलाकार से बात करते थे।

कारंत का किरदार कोई एक्टर नहीं कर सकता

नाटक कारंत पर बेस्ड था, लेकिन कारंत की आवाज बैकग्राउंड में सुनाई देती है। डायरेक्टर का कहना है कि इस रोल को करना किसी एक्टर के लिए आसान नहीं होगा। कारंत का रोल सिर्फ कारंत ही कर सकते हैं, इसलिए उनका किरदार अप्रत्यक्ष रखा गया है। नाटक की कहानी एक ऐसे एक्टर की है जो कैरेक्टर की तलाश में भटकता रहता है।

अगर नाटक में कोई कैरेक्टर नहीं होगा तो वह नाटक नहीं कहलाएगा। इसलिए इस नाटक के जरिए कारंत की जर्नी को दिखाने की कोशिश की गई। मंच पर एक एक्टर की तलाश में तो दूसरा कैरेक्टर की तलाश में भटकता हुआ दिखाई देता है। दूसरा कलकार गांव से एक्टर बनने के लिए आया है। सफलता न मिल पाने के कारण वह परेशान है। वह मुखौटों को चोरी कर एक्टर बनने निकलता है। वह एक्टर अपने खोए हुए कैरेक्टर को खोजने की कोशिश करता है। नाटक के अंत में नाटककार बोलता है नाटक को लिखा नहीं जा सकता है और न ही उसका निर्माण किया जा सकता है। बल्कि नाटक तो होने की एक प्रक्रिया है।

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