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MP Politics- जब कांग्रेस ने प्रथम नागरिक की आसन्दी का हाथों में आया पद लौटा दिया

Ek Political Kissa- जानें सतासीन होने का छह महीने के लिए मौका मिलने के बावजूद कांग्रेस ने प्रथम नागरिक की आसन्दी क्यों नहीं संभाली

- कमलनाथ सरकार ने जारी नहीं किया था महापौर पद पर नियुक्ति का आदेश

भोपाल

Published: May 24, 2022 12:59:09 pm

मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के ओबीसी आरक्षण के साथ चुनाव करने के आदेश के बाद पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव के लिए आरक्षण कराने की तैयारी शुरू कर दी है। ऐसे में माना जा रहा है कि मध्यप्रदेश में जल्द ही ये चुनाव हो सकते हैं। पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव को लेकर आज हम आपको नगर निगम ग्वालियर से जुड़ा एक ऐसा किस्सा बताने जा रहे हैं, जहां एक बार कांग्रेस ने महापौर पद की अपने पास आई थाली लौटा दी थी।

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ये है किस्सा:
कांग्रेस पार्टी लम्बे समय तक प्रदेश की सत्ता में रहने के बावजूद पिछले साठ साल से ग्वालियर निगम के महापौर पद को संभालने के लिए तरस रही है, लेकिन कुछ साल (करीब तीन वर्ष) पहले एक ऐसा मौका भी आया था, जब कांग्रेस ने परसी हुई थाली लौटाते हुए महापौर पद संभालने से इंकार कर दिया था।

दरअसल यह स्थिति तत्कालीन महापौर विवेक शेजवलकर के इस्तीफे के बाद बनी थी। उस वक्त निगम परिषद का कार्यकाल सिर्फ छह महीने बचा था, लिहाजा महापौर पद का चुनाव न कराते हुए परिषद में से ही किसी पार्षद को महापौर पद की जिम्मेदारी सौंपने का विकल्प था। प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार अपनी पार्टी के किसी भी पार्षद को आसानी से महापौर नियुक्त कर साठ साल का सूखा समाप्त कर सकती थी, लेकिन कांग्रेस ने अपना महापौर बनाने के बजाए आगामी निगम चुनाव तक इंतजार करने की रणनीति बनाई।
यह बात अलग है कि तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष कृष्ण राव दीक्षित महापौर के ओहदे का प्रोटोकॉल अघोषित रूप से निभाते हुए प्रदेश सरकार द्वारा बुलाई बैठकों में ग्वालियर निगम की नुमाइंदगी करने लगे थे, लेकिन कमलनाथ सरकार ने महापौर पद पर उनकी नियुक्ति का आदेश जारी नहीं किया।

किसी भी नगर निगम में महापौर एक ऐसा पद होता है जिसके लिए बड़े-बड़े नेता भी हमेशा तैयार रहते हैं, लेकिन उस वक्त ग्वालियर का महापौर बनने के लिए कोई नजर नहीं आ रहा था। भाजपा के महापौर विवेक शेजवलकर ने सांसद बनने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया और निगम चुनाव से छः महीने पहले 'कांटो भरा ताज' कोई पहनना नहीं चाहता था, नेता प्रतिपक्ष दीक्षित से लेकर उपनेता चर्तुभुज धनोलिया कुछ इच्छुक भी दिखे, लेकिन उन्हीं की पार्टी की सरकार ने मोहर नहीं लगाई ।

ग्वालियर निगम के शीर्ष पद पर दोनों ही दलों में से कोई पार्षद या नेता बैठने से पहले तमाम तरह के गुणा भाग लगाते रहे। जब नगर निगम का चुनाव होने में महज 6 महीने बचे थे और ऐसी सूरत में लगभग 4 महीने तक ही नया महापौर काम कर सकता था,ऐसे में आचार संहिता के चलते कामों की स्वीकृति नहीं मिलती।

इन चार महीने में कोई महापौर शहर की कायापलट नहीं कर सकता था, जबकि यही 4 महीने जनता की शिकायतें व नाराजगी झेलने वाले थे। 2019 में जून से सितम्बर तक गर्मी और बारिश के चलते ग्वालियर शहर के कई इलाकों में पानी न आने और गंदा पानी की शिकायत जनता कर रही थी। बिजली कटौती पहले से ही थी।

कांग्रेस के नीति निर्धारकों का कहना था कि बरसात आने से पहले भाजपा शासित नगर निगम ने न तो नालों की सफाई की और न ही बारिश का पानी संरक्षित करने के उपाय किए, ऐसे में यदि कांग्रेस का कोई नेता महापौर की आसन्दी पर विराजेगा तो उसे उन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, जिनके लिए वह नहीं बल्कि भाजपा जिम्मेदार है।

भाजपा के जाल में फंसते - फंसते रह गई कांग्रेस :
ग्वालियर नगर निगम के इतिहास में 1963 के बाद से अभी तक कांग्रेस का महापौर नहीं बना है। ग्वालियर निगम में कुल पार्षदों की संख्या 66 है। तत्कालीन परिषद में कांग्रेस के सिर्फ 10 है और भाजपा के 49 पार्षद थे।

कांग्रेस का कहना था कि जब साढ़े 4 साल तक भाजपा का महापौर रहा है तो बाकी के 6 महीने भी भाजपा ही नगर सरकार चलाए, जबकि भाजपा की सोच थी कि जबप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई है तो बाकी रहे कार्यकाल के लिए ग्वालियर निगम की जिम्मेदारी कांग्रेस संभाले, लेकिन कांग्रेस भाजपा के इस जाल में नही फंसी। कांग्रेस के नेता यह अच्छी तरह जानते थे कि यदि वह अपना महापौर बनाते है तो अगले निगम चुनाव में इन सब नाकामी का जवाब भी उन्हें ही देना पड़ेगा।

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