13 वी शताब्दी के कोर्णाक मंदिर में 117 साल बाद लौटेगा वैभव

( Odisha News ) कोर्णाक सूर्य मंदिर ( Konark Sun Temple ) के 113 फुट जगमोहन मंडप (मूर्तिस्थल) से 117 साल बाद बालू मिट्टी ईंटें हटायी ( After 117 Years, Sun temple will renovated ) जाएंगी। बंगाल की खाड़ी से आने वाली समुद्री हवाओं के क्षरण से 13वीं शताब्दी के कोर्णाक मंदिर को बचाने को फिरंगी हुकूमत ने 1903 में जगमोहन में बालू ईंटे भरवाकर सील कर दिया था।

By: Yogendra Yogi

Published: 01 Mar 2020, 06:07 PM IST

कोर्णाक (पुरी): ( Odisha News ) कोर्णाक सूर्य मंदिर ( Konark Sun Temple ) के 113 फुट जगमोहन मंडप (मूर्तिस्थल) से 117 साल बाद बालू मिट्टी ईंटें हटायी ( After 117 Years, Sun temple will renovated ) जाएंगी। बंगाल की खाड़ी से आने वाली समुद्री हवाओं के क्षरण से 13वीं शताब्दी के कोर्णाक मंदिर को बचाने को फिरंगी हुकूमत ने 1903 में जगमोहन में बालू ईंटे भरवाकर सील कर दिया था। यह बंगाल के लेफ्टीनेंट गवर्नर जे.ए.बोर्डलियन के आदेश से किया गया। अब इसकी भव्यता वापसी की कोशिशे एक बार फिर तेज हो गयी हैं।

एएसआई ने लिया फैसला
यह फैसला एएसआई की सेमिनार में लिया गया। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से इस पर रिपोर्ट मांगी गई है। हालांकि 2013 में सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने रिपोर्ट दी थी कि इंडोस्कोपी से जगमोहन का बारीकी से निरीक्षण किया जा सकता है। इसमे पाया गया था कि बालू 12 फुट नीचे बैठ गयी थी। सीबीआरआई के वरिष्ठ साइंटिस्ट अंचल मित्तल की रिपोटज़् के अनुसार कुछ पत्थर टूटकर जगमोहन में गिरे हैं। उनकी रिपोर्ट में दो विकल्प थे। पहला तो यह कि जगमोहन को खाली कराके इसमें पत्थर भर दिए जाएं और दूसरा यह कि इसमें फिर से बालू ठसाठस भर दी जाए। तभी इसे बचाया जा सकता है। एक अन्य विशेषज्ञ इंजीनियर जीसी मित्रा कहना है कि बालू हटाना जोखिम हो सकता है।

विशेषज्ञों की कमेटी
एएसआई के भुवनेश्वर पुरातात्विक अधीक्षक अरुण मलिक का कहना है कि विशेषज्ञों की समिति गठित की जाएगी जो जगमोहन से बालू हटाने पर अपनी रिपोर्ट देगी। विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण में बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है। पुरातत्वविद बीके रथ कहते हैं कि बालू हटाना उचित होगा या नहीं। इस पर भी कमेटी बनायी जानी चाहिए।

वल्र्ड हेरिटेज का दर्जा प्राप्त
देश के पूर्वी अंचल का यह ऐतिहासिक स्मारक वल्र्ड हेरिटेज का स्टेटस प्राप्त है। इसके लिए फूंक-फूंक कर कदम उठाए जा रहे हैं। बहरहाल केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद भुवनेश्वर से डेढ़ घंटे की दूरी पर समुद्र तट पर स्थित कोर्णाक के सुप्रसिद्ध सूर्य मंदिर के दिन फिरते दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अमेरिका में अपने एक भाषण में इसका जिक्र किया था। यहां पर हर साल 30 से 35 लाख तक पर्यटक आते हैं। तीन मंडपों में बंटे इस सूर्य मंदिर का मुख्य मंडप और नाट्यशाला ध्वस्त हो चुके हैं। ढांचा भर रह गया है। इसके बीच के हिस्से को सूर्य मंदिर कहते हैं। वक्ती नजारा यह है कि सैकड़़ों पाइपों का सहारा देकर इसे टिकाए रखा गया है। जगमोहन मंडप बीते 117 साल से बंद पड़ा है। अब उसे खोलने की उम्मीद तो बंधी है पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय से इस पर खतरा बरकरार है।

राजा नृसिंह देव ने सन 1256 में बनवाया
गौरतलब है कि कोर्णाक मंदिर को गंगवंश के राजा नृसिंह देव ने 1256 ईस्वी में बनवाया था। मुगल शासनकाल में कई हमले और प्राकृतिक आपदाओं के चलते मंदिर को खराब होता देख फिरंगी हुकूमत के दौर में जगमोहन मंडप में बालू भरकर इसके के चारों दरवाजों पर दीवारें उठवा दी। हालांकि 1994 में इटली के वास्तुशास्त्री और यूनेस्को के सलाहकार प्रोफेसर जार्जियो कोसी ने अपने एक अध्ययन में कहा था कि मंडप बंद किए जाते वक्त मंदिर की दशा उतनी जर्जर नहीं थी जितना अनुमान लगाया गया था। अन्य विशेषज्ञों ने सुझावों दिए थे बालू हटाने और मंदिर खोलने की सिफारिश की थी।

9 साल पहले भी बनी थी कमेटी
कोर्णाक मंदिर के संरक्षण पर करीब नौ साल पहले भी विशेषज्ञों की एक कार्यशाला में कुछ ऐसी ही राय बनी थी जिनकी सिफारिशें लागू कराने के लिए एएसआई ने अधिकार संपन्न एक समिति बनायी थी। एएसआई महानिदेशक खुद इसके अध्यक्ष थे। राज्य के सांस्कृतिक सचिव, आईआईटी खड्गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर, उत्कल विवि के पुरातत्व विभागके प्रमुख रहे सदाशिव प्रधान, सीबीआरआई रूड़की निदेशक, पुरी जिलाधिकारी जैसे दिग्गज सदस्य नामित किए गए। सीबीआरआई टीम ने कोर्णाक मंदिर को जगमोहन की इंडोस्कोपी से फोटो लिए और वीडियो भी बनाए थे। एक सदस्य प्रधान तो जगमोहन यानी मूर्तिस्थल खाली कराके मूर्तियां रखने तक की बात कही थी।

मंदिर में हैं तीन सूर्य प्रतिमाएं
कोर्णाक मंदिर मे लाल बलुए पत्थर पर सूर्यदेव केरथ की बेहतरीन नक्काशी है। मंदिर स्थल को 12 जोड़ी चक्रों वाले, सात घोड़ों से खींचे जाते हैं। सूर्यदेव के एक रथ के रूप बनाया गया है। इनमें से एक ही घोड़ा बचा है। कोर्णाक की पहचान बन चुके रथ के पहिए बहुत से चित्रों में दिखायी देते हैं। तीन सूर्य की प्रतिमाएं भी हैं। एक उगते सूर्य की 8 फुट की, दूसरी दोपहर के सूर्य 9.5 फुट और तीसरी सूर्यास्त की साढ़े 3 फुट की। इन्हें संग्रहालय में रखा गया है। प्रवेश द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रामक मुद्रा में आतुर दिखते हैं।

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