ओडिशा में प्रवासी श्रमिकों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट, UP की तर्ज पर प्रवासी आयोग की मांग

Odisha News: ज्यादातर आए प्रवासी श्रमिक वापसी के मूड में नहीं, मनरेगा में खेती को पहाड़ों पर टेरिसिंग का सुझाव (Migrant Commission Demand Raised In Odisha)...

 

By: Prateek

Updated: 28 May 2020, 09:18 PM IST

महेश शर्मा
भुवनेश्वर: तीन मई से आज तक हजारों की संख्या में ओडिया प्रवासी श्रमिकों का सपरिवा अपने राज्य को वापसी का सिलसिला जारी है। बीते 24 घंटों में 14,507 प्रवासी श्रमिक लौटे हैं। इनकी संख्या बढ़कर 3,36,388 हो चुकी है। और वापसी के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वालों की संख्या भी 16 लाख से ऊपर बताई जाती है। इन्हें रोजी-रोटी के लिए मनरेगा में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

प्रवासियों को काटने पड़ रहे चक्कर...

मनरेगा में साल में 200 दिन तक काम और करीब 208 रुपया रोज मजदूरी दिलाने का वादा किया गया था पर अब तक जॉब कार्ड बनाने तक की शुरुआत नहीं की जा सकी। क्वारंटाइन के बाद मिलने वाली प्रोत्साहन राशि दो हजार रुपया लेने के लिए भी प्रवासियों को चक्कर काटने पड़ रहे हैं।


प्रवासियों को रखने के लिए सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में 16,632 स्थायी मेडिकल सेंटर और 6,632 पंचायतों में क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए हैं। इनमें कुल 7,31,814 बेड की व्यवस्था की गयी है। कुशल प्रबंधन हो इसके लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के आदेश पर सरपंचों को कलक्टर के अधिकार दे दिए गए। कई सरकारी-गैरसरकारी अस्पतालों को कोविड-19 अस्पताल में परिवर्तित कर दिया गया। प्रवासियों की लगातार बढ़ती भीड़ और सरकार के आश्वासन के अनुसार प्रभावी तैयारियां न होने के कारण दिक्कत बढ़ रही है।

सिविल सोसाइटी के लोगों में कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालने का मशविरा मानते हुए प्रवासियों के पुनर्वासन, दूसरे राज्यों में काम के लिए जाने के बजाय ओडिशा में ही इन्हें इनकी क्षमता के मुताबिक कार्य देने की बात चर्चा में आ चुकी है। स्किल मैपिंग का काम शुरू करने के साथ ही प्रवासी आयोग के गठन की मांग उठने लगी है। सिटिजन एक्शन ग्रुप फॉर कोरोना के सलाहकार जगदानंद कहते हैं कि प्रवासियों के लिए इंटर-स्टेट आयोग बनाए जाने की जरूरत है। यूपी सरकार के प्रवासी आयोग गठन के निर्णय को उन्होंने बेहतर पहलकदमी बताया है।

वह कहते हैं कि री-माइग्रेशन को ग्रामीण इकोनॉमी को मजबूती देने का अवसर के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि प्रवासी श्रमिकों की स्किल मैपिंग करके उनकी क्षमताओ का डेटा तैयार होना चाहिए जो आगे काम आ सकता है। यह प्रक्रिया तो अब तक शुरू हो जानी चाहिए थी। जगदानंद कहते हैं कि गंजाम को मॉडल डिस्ट्रिक्ट के रूप में डेवलेप किया जा सकता है। सबसे ज्यादा यहीं के श्रमिक सूरत गए हैं। इनमें अधिकतर कुशल श्रमिक हैं।

वह कहते हैं कि गंजाम को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। गोपालपुर में टाटाग्रुप के एक प्लांट के लिए जमीन पर औद्योगिक गतिविधियां यहां शुरू की जानी चाहिए। वह कहते हैं कि प्रवासी श्रमिक बहुत बड़ा मुद्दा है जो कोरोना काल में तेजी से उभरा है। यदि प्रवासियों को उनके राज्य में ही कार्य का वातावरण दें तो फिर वो क्यों पलायन करेंगे? उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक आयोग गठित किया जाना चाहिए। ओडिशा में माइग्रेशन आयोग गठित किया जाना चाहिए। केंद्र ने प्रवासी श्रमिकों पर फैसले लेने का राज्यों पर छोड़ दिया है। यूपी में प्रवासी आयोग गठन की दिशा में काम शुरू हो गया है।

लौटने के मूड में नहीं प्रवासी...

ओडिशा में प्रवासी श्रमिकों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट, UP की तर्ज पर प्रवासी आयोग की मांग

ओडिशा पहुंच चुके लगभग साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा प्रवासी श्रमिक अब लौटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे कई श्रमिक हैं क्वारंटाइन अवधि पूरी करने के बाद घरों पर बैठ गए हैं। वर्ष 2011 की जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार लगभग साढ़े 13 लाख ओडिशावासी आसपास के राज्यों में नौकरी कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश गुजरात के सूरत में हैं। ओडिशा वापसी के लिए सरकार के पोर्टल पर अब तक रजिस्ट्रेशन (इनमें अधिकांश श्रमिक हैं, छात्र, व अन्य श्रेणी के नौकरपेशा, व्यवसायी भी शामिल हैं) करा चुके 15 लाख से भी ज्यादा लोग दर्शाते हैं कि 2021 की जनगणना में यह संख्या 20 लाख तक हो सकती हैं। कोरोना पर राज्य सरकार के प्रवक्ता सुब्रत बागची के अनुसार करीब 2.90 लाख प्रवासी अब तक ओडिशा आ चुके हैं। एक जानकारी यह भी है कि लॉकडाउन से पहले 54,383 ट्रेन से और 4,380 विमानों से विदेशी लोग ओडिशा आ चुके थे। हजारों लोग पैदल, ट्रक, लारी, साइकिल आदि से पहुंच रहे हैं। सोमवार को झारखंड सीमा से ओडिशा प्रवेश करने वाले 15 सौ प्रवासी श्रमिकों पहले टेस्टिंग फिर क्वारंटाइन में भेजना वहां से उनके घरों को रवाना करना मुश्किल काम है। सुंदरगढ़ के पास कोल्हापुर-बोकारो श्रमिक स्पेशल ट्रेन की चेन पुलिंग करके 260 लोग उतर गए। इस तरह की घटनाएं ओडिशा में आम हो चुकी है। हालात बेकाबू से होते जा रहे हैं।

ताजी रिपोर्ट के अनुसार ओडिशा में 1660 पॉजिटिव पाए गए हैं और सात मौते हो चुकी हैं। हालांकि 50 प्रतिशत तक रिकवरी और 0.42 प्रतिशत मृत्युदर ज्यादा घबराने वाली बात नहीं है पर कोरोना का पैनिक तो पूरे विश्व में है। राज्य मिल रहे पॉजिटिव मामलों में 90 प्रतिशत से ज्यादा प्रवासी हैं। बलंगीर, सुंदरगढ़, कालाहांडी, बरगढ़, नुआपाड़ा, देवगढ़, गंजाम ऐसे जिले हैं जहां से भारी संख्या में ईंटभट्टा श्रमिक बाहर रोजीरोटी को जाते हैं। इनमें से बहुत से सीजनल श्रमिक होते हैं जो काम खत्म होने पर लौट भी आते हैं।

एक सूचना के अनुसार लॉकडाउन के दौरान बलंगीर में 96 हजार श्रमिक लौट चुके हैं। सिटिजन एक्शन ग्रुप ऑफ कोरोना में श्रमिकों पर काम करने वाले उमी डेनियल कहते हैं कि लगभग तीन लाख ऐसे ही प्रवासी लौट चुके हैं। लॉकडाउन के दौरान राज्य में इन्हें रखना काम देना एक चुनौती है।

मनरेगा बेहतर विकल्प...

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मनरेगा पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मानसरंजन मिश्रा IMAGE CREDIT:

मनरेगा पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मानसरंजन मिश्रा कहते हैं कि जीविका की चुनौती से निपटा जा सकता है। मनरेगा में काम बहुत है। भूमि विकास के काम में पहाड़ों पर खेती योग्य भूमि तैयार करने के लिए टेरिसिंग कराई जा सकती है। कुछ राज्यों ने मनरेगा के अंतर्गत यह कर दिखाया है। यहां पर कोरापुट जिले में काम हुआ है। मनरेगा स्थायी हल तो नहीं है तो चार-पांच साल तक रोजगार तो प्रवासियों को दिया ही जा सकता है।

महिलाओं का भी रखे ध्यान...

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राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य सोशल वर्कर नम्रता चड्ढा IMAGE CREDIT:

राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य सोशल वर्कर नम्रता चड्ढा कहती हैं कि प्रवासी श्रमिकों में महिलएं काफी संख्या में हैं। साथ प्रवासियों के परिवार भी हैं जिन्हें महिलाएं संभालती हैं। ओडिशा को स्टील, एल्युमिनियम, कोयला खानें का राज्य मान लिया गया है। अन्य छोटे, मझोले, उत्पादन देने वाले कारखाने लगाने की पहल यदि सरकार करती तो यह पलायन की नौबत ही न आती। कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों से सरकार सीख सकती है कि औद्योगिक विकास पर जोर दे और अपने राज्य का श्रमबल अन्य राज्यों में धक्के खाने क्यों जाए? तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ स्वयंसेवी समूह के माध्यम से उठाया जा सकता है।

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