कीर्ति आजाद के कांग्रेस में शामिल होने से क्या बदल गया है दरभंगा लोकसभा सीट का सियासी समीकरण, जानें जमीनी हकीकत

कीर्ति आजाद के कांग्रेस में शामिल होने से क्या बदल गया है दरभंगा लोकसभा सीट का सियासी समीकरण, जानें जमीनी हकीकत

Prateek Saini | Publish: Feb, 22 2019 11:21:30 PM (IST) | Updated: Feb, 22 2019 11:31:01 PM (IST) Bihar Election

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए बिहार में सियासी सरगर्मियां तेज हो चली है। मिथिला का दिल कहे जाने वाले दरभंगा लोकसभा सीट के मौजूदा सांसद कीर्ति आजाद के कांग्रेस में शामिल होने के बाद यहां की राजनीति गर्मा गई है। कीर्ति के कांग्रेस में शामिल होने के बाद दरभंगा की राजनीतिक स्थिति पर पढ़े यह पड़ताल।

(पटना, दरभंगा) आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार की राजनीति में रोचक मोड़ नजर आ रहे हैं। 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी भाजपा-जदयू के बीच अभी सीटों के नाम घोषित नहीं हुए हैं, तो महागठबंधन की स्थिति भी कुछ स्पष्ट नहीं है। मिथिला का दिल कहे जाने वाली दरभंगा लोकसभा सीट सबसे ज्यादा डिमांड में चल रही है और इसे लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। राजग और महागठबंधन में ही इस सीट के कई दावेदार आमने-सामने हैं। दरभंगा से दो बार के सांसद कीर्ति आजाद द्वारा कांग्रेस का दामन थाम लेने से यहां नए समीकरण उत्पन्न हो गये हैं। ऐसे में एनडीए और महागठबंधन किस तरह चुनावी शतरंज पर अपनी चाल बिछाएंगे यह देखने लायक होगा।

महागठबंधन की गांठ
वर्तमान सांसद कीर्ति आजाद दरभंगा से ही ताल ठोकना चाहते हैं, हालांकि बिहार कांग्रेस अध्यक्ष ने स्पष्ट कर दिया है कि सीटों और उम्मीदवारों की घोषणा बाद में होगी। लेकिन जानकारों की मानें तो कीर्ति आजाद दरभंगा से टिकट मिलने के आश्वासन पर ही कांग्रेस में आए हैं। इससे माना जा रहा है कि पार्टी आजाद को दरभंगा से मैदान में उतार सकती है। हालांकि बिहार में कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने और सीटों के बंटवारे को लेकर कोई अधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन ने सीटों के लिहाज से जिस प्रकार कांग्रेस को बेहद कम करके आंका है, अगर वही स्थिति बिहार में भी रही तो महागठबंधन में जाने को लेकर कांग्रेस पुनर्विचार कर सकती है। महागठबंधन के एक अन्य घटक दल विकासशील इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी भी दरभंगा से ही चुनाव लड़ने पर आमादा है। जबकि राजद नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मो. अली अशरफ फातमी भी दरभंगा के पुराने क्षत्रप रहे हैं, पर बताया जा रहा है कि उन्हें मधुबनी सीट से मैदान में उतारने की तैयारी चल रही है।

राजग की स्थिति
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भाजपा, जदयू और लोजपा की तिकड़ी मजबूत स्थिति में खड़ी है। एक टीवी चैनल पर आए सर्वे में भी इस गठबंधन को बढ़त दिखाई गई है। राज्य में मुख्यमंत्री नितीश कुमार की स्वच्छ छवि और केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार का साथ इस गठबंधन को डबल माइलेज प्रदान कर रहा है। राजग की ओर से सीटों की संख्या के बारे में तो अधिकारिक घोषणा हो चुकी है, लेकिन सीटें कौन सी होंगी इसको लेकर अभी तक संशय बरकरार है। लिहाजा दरभंगा में भाजपा और जदयू दोनों के ही दावेदार अपना दम दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। जदयू की तरफ से संजय कुमार झा अपनी दावेदारी समय-समय पर पेश करते रहे हैं और हर छोटे-बड़े विकास का श्रेय भी लेने का प्रयास कर रहे हैं। संजय झा ने 2014 में भी दरभंगा से चुनाव लड़ा था और 12 प्रतिशत मत प्राप्त करते हुए तीसरे स्थान पर रहे थे। उधर भाजपा की ओर से ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ. एस.पी. सिंह को भाजपा की तरफ से दावेदार माना जा रहा है। डाॅ. एस.पी. सिंह का पहले दरभंगा मेडिकल काॅलेज में प्राचार्य के पद पर और फिर बाद में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर एक लंबा कार्यकाल रहा है और वे लोगों के बीच अपनी पहचान रखते हैं। उन्होंने 25 सितंबर को पटना में वरिष्ठ भाजपा नेताओं की उपस्थिति में पार्टी का दामन थामा था। हालांकि डाॅ. एस.पी. सिंह ने अभी अपनी दावेदारी पेश नहीं की है, लेकिन क्षेत्र में उनकी सक्रियता के यही मायने लगाए जा रहे हैं, कि भाजपा उन्हें अपना उम्मीदवार बना सकती है।

चुनावी समीकरण
कांग्रेस में शामिल हुए कीर्ति आजाद मैथिल ब्राह्मण कैटेगरी से आते हैं, जो दरभंगा का कोर वोट माना जाता है। लेकिन उनके खिलाफ 10 साल की जबरदस्त एंटी इन्कम्बेंसी है। स्थानीय स्तर पर उनको विजिटिंग सांसद के तौर पर देखा जाता है, क्योंकि उनका अधिकांश समय दिल्ली में ही बीतता था। लेकिन महागठबंधन को मुस्लिम-यादव समीकरण और कुछ ब्राह्मण वोटों को आधार बनाकर कीर्ति को जिताने का प्रयास करेगा। कीर्ति आजाद दल बदलने को लेकर कांग्रस में अपनी घर वापसी बता रहे हैं, लेकिन उनके अपनी ससुराल दरभंगा में जनता उनकी वापसी कराएगी या नहीं, यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे।

दूसरी तरफ यदि राजग की तरफ से जदयू नेता संजय झा को मैदान में उतारा जाता है, तो ब्राह्मण वोट बंटने के आसार बनते हैं। जबकि भाजपा कार्यकर्ता इस सीट पर जदयू के लिए कितने उत्साह से काम करेंगे कह पाना मुश्किल है। दरभंगा को परंपरागत तौर पर भाजपा की सीट माना जाता है, ऐसे में यदि यह सीट जदयू के खाते में जाती है तो भाजपा कार्यकर्ताओं का जोश ठंडा अवश्य पड़ेगा। इस स्थिति को भांपते हुए यदि राजग इस सीट को भाजपा के खाते में डालता है और भाजपा किसी सवर्ण उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, तो वह महागठबंधन की ओर से कीर्ति आजाद से मुकाबले में बीस पड़ सकता है।

बहरहाल, चुनाव आते-आते कई समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे। इस सीट से कौन मैदान में उतरेगा और कौन बाजी मारेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि दरभंगा लोकसभा सीट पर उम्मीदवारों का निर्णय लेना दोनों की पक्षों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

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