बंजर भूमि से काले सोने की उपज, प्रदेश में पहली बार साजी की खेती

बंजर भूमि से काले सोने की उपज, प्रदेश में पहली बार साजी की खेती

By: dinesh swami

Published: 17 Sep 2021, 08:26 PM IST

-दिनेश स्वामी

बीकानेर. बंजर, लवणीय और अनुपयोगी भूमि पर सीमावर्ती किसानों ने साजी की व्यवस्थित खेती करनी शुरू कर दी है। अभी तक पाकिस्तान से आयात होने वाली साजी के पौधे की इसी के साथ देश में पहली बार खेती की शुरुआत हुई है। इसके पौधे को जलाकर काले रंग की पत्थर माफिक साजी बनती है। जिसका उपयोग पापड़ बनाने में किया जाता है। इस साल नहरों में पानी नहीं मिलने से जहां सीमावर्ती सिंचित क्षेत्र की उपजाऊ भूमि में फसलें बहुत कम है, वहीं बंजर पड़ी भूमि पर साजी के पौधों की हरियाली नजर आ रही है।

बीकानेर जिले के खाजूवाला क्षेत्र में किसानों ने पिछले साल बंजर भूमि पर कहीं-कहीं उगे झाड़ीनुमा साजी के पौधों को जलाकर साजी तैयार की थी। जिसे बीकानेर के पापड़ निर्माताओं २०० रुपए प्रति क्विंटल तक के भाव से खरीदा। इसके साथ ही किसानों को अनुपयोगी समझे माने वाले वाले इस पौधे की अहमियत समझ में आई। किसानों ने साजी के बीज एकत्र किए और डेढ़-दो महीने पहले बंजर भूमि पर बीजों को फेंक दिया। वह पौधे अब खेतों में खड़े नजर आने लगे हैं।

बजंर को बनाता उपजाऊ

साजी का पौधा जिस भूमि पर लगातार दो-तीन साल उग जाता है, उसे उपजाऊ बना देता है। प्रगतिशील किसान शंभूसिंह राठौड़ ने बताया कि लवणीय और पक्की भूमि पर ही पौधा उगता है। पौधा भूमि से नमक को सोखकर अपनी बढ़वार करता है। एेसे में भूमि से लवणीय मात्रा कम हो जाती है और खेती योग्य भूमि हो जाती है। साजी का पौधा कड़वा होने से इसे कोई पशु भी नहीं खाते।

१० मुरब्बा में व्यवस्थित खेती

भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमावती क्षेत्र में इस बार करीब १० मुरब्बा भूमि पर साजी की खेती हुई है। खाजूवाला क्षेत्र के चक १३ केवाइडी के बीरा सिंह के तीन बीघा बंजर खेत में साजी के पौधे खड़े है। किसान शंभूसिंह ने डेढ़ मुरब्बा अनुपयोगी भूमि ठेके पर लेकर साजी बोई है। शंभूसिंह को खेती में नवाचार के लिए नाबार्ड ने सम्मानित भी किया है। खाजूवाला से सटी ईंट भट्टे की दो मुरब्बा अनुपयोगी भूमि पर पौधे लहलहा रहे है। चक ४० केवाइडी तथा १७ केवाइडी में रामचन्द्र बावरी ने साजी बोई है। चक ४० केवाइडी में रामकुमार गोदारा ने खेती की है। चक २८ बीडी में प्राकृतिक रूप से साजी के पौधे उगे हुए है।

सरकार के रेकॉर्ड में नहीं साजी

राज्य सरकार ने साजी की पौधों से बनने वाले कृषि उत्पाद साजी को लेकर कृषि या कृषि उत्पाद में सूचीबद्ध नहीं किया है। पौधे को जलाकर साजी बनती है। अनाज मंडियों की गुड्स (कृषि उत्पाद से बने उत्पाद) में शामिल नहीं है। कृषि अनुंसाधन से जुड़े वैज्ञानिकों को तो मालूम भी नहीं कि साजी क्या है।

फेल हुआ समुंद्री खार का प्रयोग

बीकानेर में पापड़ उद्योग की सौ से अधिक बड़ी और दर्जनों छोटी इकाइयां हैं। दो साल पहले पाकिस्तान से साजी के निर्यात पर रोक लगाने के बाद पापड़ उद्योग ने साजी के विकल्प के रूप में समुंद्री खार का उपयोग शुरू किया। परन्तु यह प्रयोग सफल नहीं रहा और वापस साजी पर निर्भरता बढ़ गई।

इसलिए जरूरी पापड़ में साजी

साजी एक तरह का औषधीय पौधा है। इसे जलाने पर निकलने वाले रस को ठंडा करने पर वह काले पत्थर का रूप ले लेता है। जिसके घोल को पापड़ गूंदने के पानी में मिलाया जाता है। साजी से पापड़ कई दिन तक खराब नहीं होते। साथ ही खाने वाले का हाजमा ठीक रहता है। पापड़ में प्राकृतिक स्वाद भी साजी से ही आता है।

dinesh swami Reporting
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