भारतीय अर्थव्यवस्था कृत्रिम विकास की राह पर है।

भारतीय अर्थव्यवस्था कृत्रिम विकास की राह पर है

By: dinesh swami

Published: 06 Mar 2021, 02:09 PM IST

-डॉ पी एस वोहरा,आर्थिक मामलों के जानकार

भारतीय समाज की आर्थिक संरचना में मध्यमवर्गीय व्यक्तियों की संख्या सबसे ज्यादा है परंतु यह भी एक सच्चाई है कि प्रत्येक मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने जीवन में आर्थिक संघर्ष तुलनात्मक रूप से अन्य वर्गों के व्यक्तियों से ज्यादा करता है। हालांकि यह कथन प्रथम दृष्टि में विसंगतियों से भरा दिखता है क्योंकि भारतीय समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जिसके पास अपनी दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी आर्थिक सुरक्षा नहीं है। परंतु यकीनन जब आप विश्लेषणात्मक अध्ययन करते हैं तो यह पाते हैं कि मध्यमवर्गीय व्यक्ति के जीवन में आर्थिक असंतोष बहुत अधिक है तथा इसके कई कारण हैं। इन कारणों का उसके पास मात्र एक ही हल है और वह है, निरंतर आर्थिक नियोजन। उसे यह प्रतिदिन अनुमान करना होता है कि उसके पास आय व व्यय का आधार क्या है क्योंकि उसके जीवन में आर्थिक स्तर पर अनिश्चितता बहुत अधिक रहती है।

शोध का विषय यह है कि एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के जीवन में आर्थिक असंतोष क्यों है? इसके पीछे मुख्य रूप से उसके आर्थिक जीवन से संबंधित दो तरह की विशेषताएं हैं। पहली दशा में वह लगातार अपनी क्रय क्षमता को बढ़ाना चाहता है ताकि वह उन सब सुख सुविधाओं का उपभोग कर सके जो एक उच्चस्तरीय जीवन के लिए आवश्यक है। हालांकि पिछले कुछ समय से वैश्वीकरण की तीव्र दौड़ में हर उत्पाद का बाजारीकरण इतना अधिक हो चुका है कि प्रत्येक उपभोक्ता को विभिन्न प्रोडक्ट्स से सेटिस्फेक्शन लेवल अपेक्षाकृत कम ही रहता है। दूसरे पक्ष के तहत मध्यमवर्गीय व्यक्ति एक आर्थिक निवेशक बन कर अपने भविष्य को विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं से सुरक्षित करना चाहता है।

हालांकि यह दोनों पक्ष किसी भी व्यक्ति की आर्थिक सफलता की दृष्टि से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित हैं परंतु समस्या यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के अंतर्गत मध्यमवर्गीय व्यक्ति की आर्थिक आय के स्तर में प्रतिवर्ष वृद्धि की दर काफी कम है। इस दशा में या तो वह अपनी क्रय क्षमता को बढ़ा सकता है अथवा वह वित्तीय निवेश करके भविष्य को सुरक्षित कर सकता है।

ये स्थिति एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के साथ पिछले 50 वर्षों से लगातार चल रही है। हालांकि 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद से भारतीय समाज के अंतर्गत मध्यमवर्गीय व्यक्ति का आर्थिक जीवन काफी समृद्ध भी हुआ है तथा मध्यमवर्गीय व्यक्ति के विभाजन की दो श्रेणियां उच्च मध्यम वर्गीय तथा मध्यमवर्गीय व्यक्ति के रूप में हो गई है । यहां पर यह स्पष्ट करना भी अति आवश्यक है कि विगत 3 दशकों से अधिक समय से भारतीय अर्थव्यवस्था की बागडोर निजी क्षेत्रों के हाथ में हैं इस कारण रोज़गारों का सृजन लगातार हो तो रहा है परंतु इसमें भविष्य से संबंधित आर्थिक सुरक्षा तुलनात्मक रूप से सरकारी क्षेत्र से काफी कम है। यह पक्ष भी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर लगातार अनिश्चित करता रहता है।

किसी भी सामान्य शोध से यह परिणाम बड़ी आसानी से पाया जा सकता है कि एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति अगर अपने व्यक्तिगत जीवन में आर्थिक स्तर पर सक्षम हो भी गया है तब भी उसकी मुख्य चिंता बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा एक अच्छी चिकित्सीय सुविधाओं की उपलब्धता है। यह आज भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा अच्छी चिकित्सा सुविधा दोनों ही उच्चतम लागत पर ही उपलब्ध हैं। इस कारण मध्यमवर्गीय व्यक्ति इस तरह का आर्थिक नियोजन अपने जीवन में चाहता है जिसमें वह अपने जीवन स्तर को उन्नत करने के लिए लगातार तो नहीं परंतु गाहे-बगाहे त्योहारों पर ही अपनी क्रय क्षमता को बढ़ाए तथा कुछ सुख सुविधाओं के नये साधनों का उपयोग कर सकें। इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व चिकित्सा की सुविधा के लिए सफल आर्थिक नियोजन व वित्तीय निवेश करता रहे।

इन सबके बीच में महंगाई का लगातार बढ़ना चाहे वह खाद्य पदार्थों, पेट्रोल-डीजल,एलपीजी के मूल्यों से संबंधित हो, यह सब उसके आर्थिक नियोजन को लगातार बिगड़ते रहती हैं। इसके अलावा अगर वह वित्तीय निवेश का सोचता भी है तो बैंक जमाओं पर मिलने वाला ब्याज पिछले कई वर्षों से लगातार काफी कम होता जा रहा है। इस कारण अपने प्रयासों से बचाये गये धन को सुरक्षित जगहों पर नियोजित नहीं कर पाता है। यह भी स्पष्ट है कि भारतीय स्टॉक मार्केट से उसे भय लगता है क्योंकि ना तो उसे स्टॉक मार्केट की गणना समझ आती है
ना ही वास्तविक रूप में स्टॉक मार्केट उसके लिए बना है। इसके अलावा आज भी बैंकिंग ऋण की लागत एक आम मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए काफी ज्यादा है। यह शत-प्रतिशत सत्य है कि प्रत्येक आम मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने जीवन में चाहे उसे मकान का निर्माण करना हो अथवा नई कार की सुविधा का उपभोग करना हो, इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वह बैंकिंग ऋण को ही अपना आधार बनाता है।
एक पक्ष और भी है जो मध्यमवर्गीय व्यक्ति को हमेशा मानसिक परेशानी देता है कि वह सरकारों का वित्तीय पक्ष पर सर्वाधिक चहेता क्यों नहीं है? हालांकि सामाजिक संरचना में वह इतना बड़ा भाग रखता है कि वह सरकारों के चयन में अपनी निर्णय क्षमता से प्रभावित करने की दशा में हमेशा रहता है। परंतु फिर भी यह देखा गया है कि सरकारों के वित्तीय बजट के माध्यम से मध्यमवर्गीय व्यक्ति को सिर्फ आकर्षित किया जाता है जबकि आर्थिक योजनाएं उसके विकास से संबंधित नहीं पाई जाती हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक विकास तभी संभव है जब मध्यमवर्गीय व्यक्ति को आयकर की दरों में छूटे दी जाए तथा इसके माध्यम से प्राप्त वित्तीय तरलता को बैंकिंग वित्तीय निवेश में आकर्षित किया जाए या अप्रत्यक्ष रूप से उसे क्रय क्षमता को बढ़ाने का मौका दिया जाए अन्यथा भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास कृत्रिम सा प्रतीत होता है।

dinesh swami Reporting
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