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सुलगते सवाल: लगेगी आग तो बुझेगी कैसे

पीबीएम अस्पताल : पुराने ढर्रे पर अग्निशमन उपाय, फायर एंग्युशर के भरोसे पूरी व्यवस्था

बीकानेर

Published: August 03, 2022 09:38:22 am

बृजमोहन आचार्य
मध्यप्रदेश के जबलपुर के एक निजी अस्पताल में आग लगने से हुई 8 लोगों की मौत ने एक बार फिर जनमानस को झकझोर दिया है। साथ ही इस बात की पड़ताल भी शुरू हो गई है कि आखिर देश में अस्पतालों की दशा को लेकर हमारा तंत्र चेत क्यों नहीं रहा है। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल पीबीएम की बात करें, तो यहां पर भी अग्निकांड होने की स्थिति में उससे निपटने के उपाय सुलगते सवालों के घेरे में हैं। फायर फाइटिंग नाम का शब्द तो जैसे इस बेहद भीड़भाड़ वाले अस्पताल प्रबंधन के लिए चोरी-चकारी या आम व्यवस्थाओं से जुड़ा मुद्दा भर नजर आता है। प्रबंधन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कहने को तो पूरे परिसर में लगभग 380 फायर एंग्यूशर (सिलेंडरनुमा उपकरण) लगे हैं, लेकिन कितने इसमें चलित अवस्था में हैं और कितने बेकार, इसकी सटीक जानकारी प्रबंधन के पास भी नहीं है। हालांकि दावा यह है कि अधिकांश फायर एंग्यूशर भरे हुए हैं। फायर फाइटिंग एक्सरसाइज यानी अग्निकांड से निपटने के अभ्यास की बात करें, तो यह टर्म ही जैसे इस अस्पताल के लिए बिलकुल नया है। सब कुछ राम भरोसे है। राजस्थान पत्रिका ने जब पीबीएम अस्पताल के हालात इस नजरिये से खंगाले, तो बेहद भयावह स्थिति सामने आई। पेश है बानगी...।
सुलगते सवाल: लगेगी आग तो बुझेगी कैसे
सुलगते सवाल: लगेगी आग तो बुझेगी कैसे
शोपीस बने यंत्र
पीबीएम अस्पताल प्रशासन ने कई वार्डों के बाहर अग्निशमन यंत्र लगा रखे हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश की तो रीफिलिंग भी नहीं हुई है। कुछ में किसी प्रकार की तिथि तक नहीं अंकित है। इसके अलावा कई उपकरणों पर तो सिलेंडरों पर चस्पा जानकारी ही फाड़ने की कोशिश की गई है। हालांकि, दावा यह है कि पीबीएम अस्पताल में 380 फायर एंग्युशर में से अधिकांश चालू हालत में हैं। यह तथ्य और है कि इनको टेस्ट करने की प्रक्रिया हाल के वर्षों में कभी देखी नहीं गई।
दो-तीन बार लग चुकी है आग, पर नहीं चेत रहा प्रशासन
गत दस साल में पीबीएम अस्पताल में दो-तीन बार आग भी लग चुकी है। इसके अलावा निजी अस्पताल में भी कोविड के दौरान आग लगने से एक मरीज की मौत भी हो चुकी है लेकिन सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले पीबीएम अस्पताल में जैसे अग्निकांड को लेकर कोई गंभीरता नजर ही नहीं आती। जबकि यहां पर बिजली लाइनें भी बड़ी संख्या में और कई जगह बेतरतीब बिछी हुई हैं। इस वजह से शॉर्ट सर्किट होने की आशंका भी बनी रहती है।
जनरेटर के लिए डीजल तक नहीं
सुपर स्पेशयलिटी यूनिट में आग बुझाने के लिए नई तकनीक का संयंत्र लगाया हुआ है। उसके बाद भी स्थिति यह है कि यहां पर जनरेटर के लिए डीजल तक उपलब्ध नहीं हो रहा है। जबकि इसके लिए यहां के कार्मिकों ने प्रशासन को कई बार लिख कर दे दिया गया है। उसके बाद भी डीजल की कोई व्यवस्था नहीं हाे रही है। सोमवार को तो स्थिति यह हो गई थी इस यूनिट में बिजली आपूर्ति प्रभावित हो गई थी। इस वजह से ऑपरेशन थियेटर में भी अंधेरा हो गया था। साथ ही वार्डों में भी पंखे, एसी आदि बंद हो गए थे। गौरतलब है कि अग्निकांड की स्थिति में बिजली आमतौर पर काट दी जाती है। ऐसे में आधुनिक तकनीक युक्त अग्निशमन उपाय होने के बावजूद इस यूनिट में इस आपदा से कैसे निपटा जाएगा, यह सवाल अनुत्तरित ही है।
आपातकालीन कक्ष में कोई सुविधा नहीं
बच्चा अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में चौबीस घंटे बच्चों की भीड़ रहती है। इसके बाद भी यहां पर अग्निशमन यंत्र की पुख्ता व्यवस्था नहीं है। यहां पर करीब तीन माह पहले एक अग्निशमन यंत्र लगा हुआ था। इसकी रिफलिंग करने के लिए भेजा हुआ है लेकिन आज तक वापस इसे लगाया नहीं गया। बच्चा अस्पताल के वार्ड में तो यह यंत्र भी नहीं लगे हुए हैं। हालांकि अस्पताल के गलियारों में जरूर नजर आ रहे हैं, लेकिन इनमें भी किसी पर तिथि अंकित है तो किसी पर नहीं है। इसलिए यह मालूम नहीं चल रहा है कि इनकी रिफलिंग कब हुई।
महिला वार्ड में भी यही हालात
प्रसूति रोग विभाग के लेबर रूम के पास बने महिला वार्ड में भी अग्निशमन यंत्र नजर नहीं आ रहे। बरामदे में एक यंत्र लगा हुआ था लेकिन इस पर कुछ भी लिखा हुआ नहीं था। इस वजह से यह मालूम नहीं चल रहा था की इसकी सार संभाल कब हुई थी। अस्पताल परिसर में लगे अधिकांश अग्निशमन यंत्रों पर किसी प्रकार की तिथि लिखी हुई नहीं है।
समय-समय पर करते हैं सार संभाल

समय पर अग्निशमन यंत्रों की सार संभाल की जाती है। सुपर स्पेिशयलिटी यूनिट में अगर डीजल का संकट है, तो दूर करने का प्रयास किया जाएगा। नए भवनों में आग बुझाने के लिए लाइनें बिछी हुई हैं।
- डॉ. पीके सैनी, अधीक्षक पीबीएम अस्पताल

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