scriptbikaner -Pushkarna Sava | मुस्करा उठते है रिश्ते... जब टप्पा के सुरों में सगे-संबं​धियों को सुनने पड़ते है करारे व्यंग्य | Patrika News

मुस्करा उठते है रिश्ते... जब टप्पा के सुरों में सगे-संबं​धियों को सुनने पड़ते है करारे व्यंग्य

locationबीकानेरPublished: Feb 07, 2024 09:25:25 pm

Submitted by:

Vimal Changani

पुष्करणा समाज के सामूहिक विवाह के दौरान घर-घर, गली-मोहल्लों और भवनों में टप्पा गीतों की गूंज बनी रहती है। महिलाएं सामूहिक रुप से टप्पा गीतों का गायन कर सगे-संबंधियों के खान-पान, पहनावे और आदतों पर करारे व्यंग्य करती है।

मुस्करा उठते है रिश्ते... जब टप्पा के सुरों में सगे-संबं​धियों को सुनने पड़ते है करारे व्यंग्य
मुस्करा उठते है रिश्ते... जब टप्पा के सुरों में सगे-संबं​धियों को सुनने पड़ते है करारे व्यंग्य

शादी-विवाह के दौरान किसी व्यवस्था में कमी रहना अथवा भूल-चूक होना सामान्य बात है। अगर किसी प्रकार की कमी नजर आए तो उसे हंसी-मजाक में अभिव्यक्त करना व श्रेष्ठ व्यवस्थाओं की सराहना करना पुष्करणा समाज में टप्पा गीतों के माध्यम से होती है। पुष्करणा समाज के सामूहिक विवाह के दौरान घर-घर, गली-मोहल्लों और भवनों में टप्पा गीतों की गूंज बनी रहती है। महिलाएं सामूहिक रुप से टप्पा गीतों का गायन कर सगे-संबंधियों के खान-पान, पहनावे और आदतों पर करारे व्यंग्य करती है। सगा-संबंधी भी हंसते-हंसते इन गीतों का आनन्द लेते रहते है। टप्पा गीतों के गायन के दौरान न केवल माहौल खुशनुमा बनता है बल्कि ये गीत लोकप्रिय भी है। इन गीतों के गायन के दौरान महिलाओं को सराहना भी मिलती है।

इन रस्मों के दौरान होता है गायन

पुष्करणा सावा के दौरान वर-वधू पक्ष की महिलाएं जब एक-दूसरे के घर पर पहुंचती है तो मांगलिक गीतों के गायन के साथ-साथ टप्पा गीतों का भी गायन होता है। प्रसाद, खोळा, बनावा, खिरोड़ा, बारात, बरी, जान सहित मांगलिक रस्मों के दौरान महिलाएं टप्पा गीतों का गायन करती है। मायरा , देवळी धोकना की रस्म के दौरान भी इनका गायन महिलाएं अपने सगे-संबंधियों के लिए करती है।

लोक जीवन में रचे-बसे

पुष्करणा समाज में विवाह के दौरान गाए जाने वाले टप्पा गीत लोक जीवन में रचे-बसे है। इन गीतों की अपनी मिठास, लय और इनमें अपनापन है।इन गीतों में सगे-संबंधियों के प्रति अटूट प्रेम भाव झलकता है। सगे संबंधियों की उन्नति और निरोग रहने की कामना भी की जाती है। सगा-सगी के हाव-भाव, स्वभाव, पहनावा,खान पान इत्यादि पर भी व्यंग्य किए जाते है। कई अवसरों पर पुरुषों के समूह भी टप्पा गीतों का गायन करते है।

छमक कटोरी, छमक चणा, सगोजी रे घर में पंच घणा...

विवाह की रस्मों के दौरान गाए जाने वाले अनेक टप्पा गीत ऐसे है जो दशकों से महिलाओं के पसंदीदा बने हुए है। इनमें ‘छान हाले छपरो हालो, झूपड़ो भी हाले रे’, ‘कांच री कतरनी जीभ रो लेखो’, ‘ छमक कटोरी छमक चणा, सगोजी रे घर में पंच घणा’, ‘हरी मिरच लाल मिरच, मिरच बड़ी तेज रे’, ‘छाजले में छाजलों, छाजले में फटका’, ‘थारे सगो जी रे धन घणो छै’, ‘हाथ में हाथ बाजार में काथो, लाजो मरु ओ सगोजी थोरो उगाड़ो माथो’, ‘रंग छै जी रंग छै रंग री तलाई छै’, ‘बोल्यो रे बोल्यो गाळियो रे कारण बोल्यो’, ‘इणगी जाऊ उणगी जोऊ सगोजी कठै न दिखे रे’, ‘गलबल -गलबल क्या करो’, ‘और बात री रेल पेल पौणी री सकड़ाई रे’ सहित अनेक टप्पा गीतों का गायन महिलाओं की ओर से किया जाता है।

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