बदलाव : बीकानेर में निर्जला एकादशी पर किया एसी और फ्रिज का दान

Jitendra Goswami | Publish: Jun, 14 2019 11:43:45 AM (IST) Bikaner, Bikaner, Rajasthan, India

बीकानेर. निर्जला एकादशी पिछले कुछ वर्षों से दान-पुण्य का यह महापर्व भी आधुनिकता और प्रतिस्पद्र्धा की होड़ में शामिल हो गया है। सम्पन्न लोग बहन-बेटियों को मटकी और पंखी के स्थान पर एयरकंडीशनर और फ्रिज देने लगे हैं।

जयभगवान उपाध्याय

 

बीकानेर. निर्जला एकादशी को आमतौर पर मटकी, पंखी और फलाहार का दान-पुण्य किया जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से दान-पुण्य का यह महापर्व भी आधुनिकता और प्रतिस्पद्र्धा की होड़ में शामिल हो गया है। सम्पन्न लोग बहन-बेटियों को मटकी और पंखी के स्थान पर एयरकंडीशनर और फ्रिज देने लगे हैं। यह बदलाव खाने-पीने की सामग्री में भी आया है।

 

पहले इस दिन बहन-बेटियों को ठण्डाई और शर्बत दिया करते थे। अब इनका स्थान कोल्ड ड्रिंक और ड्राई फ्रूट्स ने ले लिया है। चीनी के ओळे, सेव, मटकी और पंखी देने की परंपरा अब प्रतीकात्मक होती जा रही है।

 

बढ़ जाती है बिक्री

 

विक्रेता बंशी गहलोत ने बताया कि निर्जला एकादशी से तीन-चार दिन पहले ही एयरकंडीशनर और फ्रिज की बिक्री बढ़ जाती है। लोग बहन-बेटियों को दान करने के लिए फ्रिज, कूलर, एयरकंडीशनर खरीदते हैं। उन्होंने कहा कि अब मटकियों का स्थान फ्रिज और पंखी की जगह एयरकंडीशनर व कूलर ने ले ली है।

 

समय के साथ बदलाव

 

निर्जला एकादशी पर्व पर अपनी बेटी को एसी और वाटर प्यूरीफायर देने वाले गंगाशहर निवासी राजकुमार पंचारिया ने कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी है। पंखी और मटकी अपना स्थान रखती है। दान-पुण्य के तरीकों में बदलाव आना लाजिमी है। बदलते दौर में अगर सामथ्र्यवान लोग एसी, कूलर व पंखे दान करते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है।

 

दान-पुण्य का है महत्व

 

ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी देशभर में दान-पुण्य के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। कहा जाता है कि इस दिन उपवास रखने से सालभर आने वाली एकादशी के व्रत का लाभ मिलता है। पंडित विजय कुमार ओझा के अनुसार शास्त्रों में निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य का महत्व बताया गया है। पुराने समय में मटकी का उपयोग ठण्डे पानी के लिए होता था।

 

आजकल के घरों में मटकियों की जगह फ्रिज ने ले ली है। वहीं हवा के लिए कूलर, पंखे और एयरकंडीशनर का उपयोग होने लगा है। समय के साथ दान-पुण्य के तरीकों में बदलाव आ रहा है। आस्था के इस पर्व को प्रतिस्पद्र्धा और आधुनिकता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। सामथ्र्य के अनुसार किया गया दान-पुण्य ही फलदायी माना गया है।

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