बीमार गोवंश के पेट से निकल रहे सिक्के और हेयर पिन

bikaner news: पशु चिकित्सालय में आने वाले तीसरे-चौथे जानवर के शरीर से निकल रही धात्विक वस्तुएं, घर में कम जागरूकता के चलते पशुओं पर बीत रही आफत

By: dinesh swami

Published: 13 Jul 2020, 06:30 AM IST

बीकानेर.

प्लास्टिक तो पशुओं के पेट में जाकर जहर का काम करती है लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि पशु चिकित्सालय में इलाज के लिए लाए जाने वाले बीमार पशुओं के पेट में सिक्के, हैयर पिन और सुई जैसी नुकीली वस्तुएं मिल रही है। जिन्हें पशुचिकित्सक ऑपरेशन के दौरान बाहर निकालते हैं।

पर्यावरण प्रदूषण को दृष्टिकोण में रखते हुए कुछ वर्ष पूर्व पॉलीथिन थैलियों पर लगाया प्रतिबंध सिर्फ कागजों की ही शोभा बढा रहा है। बाजार में खासकर फल-सब्जी, किराणा और खाद्य वस्तुओं के लिए दुकानों में पॉलीथिन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। यह पॉलीथिन कचरे के साथ सड़क पर खुले में आती है। वहां से बेसहारा गोवंश के पेट में चली जाती है। पॉलीथिन तो पशुओं के लिए जहर की तरह काम करती ही है। पॉलीथिन के साथ सूई, हेयर पिन, सिक्के भी खाद्य अपशिष्टों के साथ फेंक दिए जाते हैं। ये सूई और तीखी वस्तुएं पशु के पेट के साथ हृदय तक को छेद डालते हैं।

पशु निगल लेते हैं धात्विक वस्तुएं

गली-सड़कों पर घूमने वाले गोवंश खाने की तलाश में कूड़े के ढेरों में मुंह मारते दिख जाते हैं। वे पेट भरने के चक्कर में खाद्य सामग्री के साथ पॉलिथीन को भी खा लेते हैं। पॉलीथिन के साथ कई धात्विक चीजें भी निगल लेते हैं। इससे कुछ समय बाद वह गंभीर रूप से बीमार होने पर इनका ऑपरेशन कर पेट से पॉलीथिन सहित ये वस्तुएं निकाली जाती है।


पूजन सामग्री के सिक्के पेट में

जहां तक सिक्कों के निगलने का प्रश्र है तो इसमें पूजन में इस्तेमाल की गई सामग्री जैसे फूलमाला, पत्ते, प्रसाद, गुड़, नारियल, बूंदी, पताशे आदि लोग पीपल के पेड़ के पास पॉलीथिन में रख जाते हैं। इनके साथ सिक्के भी होते हैं जब गाय आदि ये चीजें खाती है तो सिक्के भी उनके साथ निगल लेते हैं।

तीन-चार महीने बाद चलता है पता

वेटरनरी विश्वविद्यालय में सर्जरी विभाग के अधीक्षक डॉ. प्रवीण बिश्रोई ने बताया कि अगर पशु पॉलीथिन खाता है तो इसका असर तीन-चार माह बाद होता है। इससे हृदय में पानी भरकर फूलकर सूजन आ जाती है। बाद में उपचार कर पानी को बाहर निकालना पड़ता है। लॉकडाउन से पूर्व प्रतिदिन कम से कम एक मामला अवश्य आता था। लॉकडाउन के दौरान दिन में तीन से चार दिन एेसे मामले आने लगे हैं।

जागरूकता जरूरी

इस बारे में गोसेवक भी चिंतित हैं। उनका मानना है कि प्लास्टिक थैलियों के इस्तेमाल पर प्रशासन कड़ाई से लगाम कसनी चाहिए। कानासर बड़ी ढाणी गोशाला संचालक गोपीकिशन अग्रवाल का कहना है कि इस मामले में आम लोगों में जागरूकता आवश्यक है। घर की महिलाओं को चाहिए कि वे किसी भी प्रकार की सामग्री पॉलीथिन में न फेंके। धातुओं से बनी वस्तुओं को भी अलग से फेंके। स्व अनुशासन से पॉलीथिन का इस्तेमाल बंद करते तब इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है।

dinesh swami Reporting
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