scriptGuest writer Pukhraj Chopra | सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते हासिल किया जा सकता है आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य - पुखराज चौपड़ा | Patrika News

सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते हासिल किया जा सकता है आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य - पुखराज चौपड़ा

वायदा बाजार: एक दृष्टि

बीकानेर

Published: April 24, 2022 07:27:49 pm

सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते हासिल किया जा सकता है आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य - पुखराज चौपड़ा
बीकानेर, राजस्थान

वायदा बाजार: एक दृष्टि

पहली बार वैधानिक रूप से सन् 1875 में बॉम्बे कॉटन ट्रेड एसोसिएशन के नाम से मुम्बई में कॉटन का वायदा व्यापार शुरू हुआ। फिर 1920 से 40 के बीच कई जिंसों को वैधानिक मंजूरी देते हुए रीजनल स्तर पर वायदा व्यापार शुरू करने की अनुमति दी गई। जिसमें जूट, कॉटन, मूंगफली तेल, चावल, चीनी और गेहूं जैसी वस्तुएं शामिल की गई। आजादी के बाद 1952 में पहली बार फॉरवर्ड ट्रेडिंग के लिए एक एक्ट तैयार किया गया। जब यह एक्ट तैयार हुआ तो रीजनल स्तर पर मैनुअल सौदों के लिए बुलियन, ऑयल सीड, कॉटन जैसी वस्तुएं थी। धीरे-धीरे इन जिस सौदों में कई और वस्तुओं को शामिल करते हुए इसका विस्तार किया गया। वर्ष 1960 के पास ज्यादा उतार-चढ़ाव के कारण प्राय: जिंसों के कारोबार को प्रतिबन्धित कर दिया गया। सिर्फ दो वस्तुओं, काली मिर्च व हल्दी को अनुमति जारी रखी गई। वो भी रीजनल स्तर पर। वर्ष 1990 के पास सरकार फिर सक्रिय हुई इसी कड़ी में विचार विमर्श के बाद पहले जारी सभी वस्तुओं पर से रोक हटा ली गई। पहले रीजनल स्तर पर कई सारे शहरों में वहां की उपज व व्यापार के अनुसार अनुमति दी गई। जिनमें मुम्बई, हापुड़, ग्वालियर, कोलकाता, कोच्चि, सिरसा, मेरठ, इंदौर, राजकोट, दिल्ली, सुरेन्द्रनगर, सांगली, मुजफ्फरनगर, बीकानेर आदि जगहों पर अलग-अलग जिंसों का कारोबार शुरू किया गया। वर्ष 2000 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन एक्सचेंजों को मंजूरी देने का विचार विमर्श चला और इस कड़ी में एनएमसीई अहमदाबाद, एनसीडीईएक्स, एमसीएक्स, आईसीएक्स, ऐस कमोडिटी का अवतरण बाजार में हुआ।
इन एक्सचेंजों में साठ तरह की वस्तुओं का व्यापार ऑनलाइन ट्रेडिंग के रूप में शुरू हुआ। कृषि उत्पादित वस्तुओं में टॉप 5 कमोडिटी सरसों, ग्वार, सोयाबीन, सोया तेल, कपास खली तथा अन्य वस्तुओं में सोना, चांदी, तांबा, नेचुरल गैस, क्रूड ऑयल ये पांच टॉप पर है। राजनीतिक व कारोबारी माहौल के नाम से 2007 में चार जिंसों चावल, उड़द, तुअर और गेहूं के उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर फूड एण्ड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन ने इस पर रोक लगा दी। मई 2008 में रबर, सोया ऑयल, आलू और चना इन चार जिंसों पर रोक लगाकर वापस एक दिसम्बर 2008 को इन्हीं चार वस्तुओं को वापस व्यापार शुरू करने की अनुमति दे दी। पहले निकाले गए गेहूं को भी 2009 अप्रेल में शामिल कर लिया गया। किसी भी राष्ट्र के साधन और उत्पादन के बीच निर्बाध प्रवाह के उद्देश्य से वायदा बाजार शुरू किया जाता है। साधनों में जमीन, फर्टीलाइजर, पानी और मानव संसाधन शामिल हैं। वहीं उत्पादन में हर प्रकार की जिंसें और अन्य उत्पादन शामिल हैं। वायदा बाजार साधन और साध्य के बीच तार्किक वितरण सुनिश्चित करता है। भारत जैसे देश में जहां 130 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए मुक्त बाजार के बजाय योजनाओं के तहत अर्थव्यवस्था चल रही है। जैसे राशनिंग के तहत अनाज उपलब्ध कराना, चुनावों के दौरान दो रूपए किलो गेहूं -चावल देना जैसी बातें वायदा में कैसे पच पाएंगी। क्या ऐसी सरकारी योजनाएं वायदा बाजार को प्रभावित नहीं करेंगी। अगर हां, तो किस जिंस को वायदा सौदों में रखा जाए और किसे नहीं इस पर एक पूरी बहस होनी चाहिए। बहस इस बात पर भी हो कि वेयर हाउसिंग सस्ता हो, मार्जीन कम हो तथा क्वालिटी की शिकायतें भी कम हो। इन विषयों पर सेबी को भी कड़ा रुख अख्तियार करना चाहिए।
सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते हासिल किया जा सकता है आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य - पुखराज चौपड़ा
सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते हासिल किया जा सकता है आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य - पुखराज चौपड़ा
मांग और आपूर्ति के बीच की खाई बढ़ा रही समस्या
जिस की फसल का भू भाग कम हो, उसे वायदा सौदे में प्रवेश देना समर्थ लोगों को सट्टेबाजी का लाइसेंस देने जैसा काम है। कृषि आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था में जहां किसान के प्रति सरकार का जो सोच है, वही सोच उपभोक्ता के बारे में भी सरकार को उतना ही रखना पड़ता है। और इस सोच के चलते दोनों के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए कभी समर्थन मूल्य बढ़ाए जाते हैं, और कभी मूल्य रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम का उपयोग किया जाता है। जरूरत तो इस बात की है कि पहले डिमाण्ड और सप्लाई का अन्तर पाटने के लिए खेती के लिए ऐसी योजनाएं बनें, जो इस खाई को पाट सके। तब निर्बाध रूप से उस जिंस का वायदा कारोबार किया जा सकता है।
अकाल के दौर में वायदा से किसी जिंस को हटाकर सरकार अपनी जिम्मेदारी का आभास कराती है लेकिन बेहतर फसल के बावजूद वायदा बाजार के साथ छेड़छाड़ सवालिया निशान लगा देती है। बेहतर होगा कि किसान और बाजार दोनों की वस्तुस्थिति को समझकर ही निर्णय किए जाने चाहिए। न परिवार किसान का प्रभावित हो, न घाटा उस किसान को पोषित करने वाले व्यापारी को हो। वायदा बाजार किसान को सीधे सीधे प्रभावित कर रहा है। बाजार में तेज भाव देखकर किसान जिसकी बम्पर बुवाई करता है, उससे इतर फसलों की बुवाई अचानक घट जाती है। दूसरी तरफ बम्पर फसलों पर सरकार को समर्थन मूल्य बढ़ाना पड़ रहा है, जिसमें निरंतर वृद्धि सरकारी खजाने को प्रभावित कर रही है। हालत यह है कि दोनों ही तरह की फसल पर सीधा असर पड़ रहा है। उदाहरण के रूप में वर्तमान में कपास की स्थिति ले सकते हैं। वायदा बाजार में कपास के बढ़े हुए दाम देखकर देश के अधिकतर किसान कपास ही उगाएंगे। इसका खामियाजा चावल, गन्ना, सोयाबीन जैसी जिंसों को उठाना पड़ेगा। अगले साल इन जिंसों की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पाएगी और कपास के भाव नीचे आ गिरेंगे। अब बड़ी संख्या में कपास से जुड़े किसानों के बचाने के लिए सरकार को समर्थन मूल्य बढ़ाना पड़ेगा। ऐसे में प्रभावित हो रही मुद्रास्फीति का सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा। ऐसे में कह सकते हैं कि वायदा सौदों से मिले भाव सरकार पर फसल का बोझ बढ़ाने के साथ महंगाई बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार होंगे। भारत में अर्थव्यवस्था को दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों की स्थिति के साथ जोडक़र देखना गलत होगा। 130 करोड़ लोगों वाले हमारे देश में मांग
और आपूर्ति में अंतर बड़ा है। हम जिस अमरीका या अन्य पश्चिमी देशों को केंद्र में रखकर अपनी नीति तैयार करते हैं, वहां मांग और आपूर्ति कमोबेश बराबर है। कारण साफ है कि हमारी जनसंख्या उनसे कई गुना अधिक है। ऐसे में भारत की खाद्यान्न नीति को स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से अनवरत परिवर्तित रखना होगा।
बीमार कर रहा वायदा बाजार
कृषि प्रधान होने के बावजूद प्रति किसान तीन एकड़ जमीन ही किसान के पास है। और जहां तक वायदा बाजार का प्रसारण है, 85 प्रतिशत किसानों को तो अब तक वायदा बाजार के बारे में जानकारी ही नहीं है। जरूरत इस बात की है कि किसानों को पहले इस बारे में जागरुक किया जाए। व बढ़ती कीमतों व घटती खेती की खाई को पाटने का प्रयास किया जाए। वायदा का एक पहलू किसान है तो दूसरा आम भारतीय। अब यह बड़ा सवाल हो जाता है कि न किसान इस बारे में जानकारी रखता है और न वो शख्स जो सुबह की मजदूरी में कमाए सौ रुपए से शाम को चूल्हा जलाता है। जो व्यक्ति किसान की बुवाई को अपने उपभोग के लिए खरीद रहा है, उसे तो वायदा से लेनदेन ही नहीं है। पुरातन परम्परा दम तोड़ चुकी है कि किसान ने बोया और आम आदमी ने खाया। अब बाजार में फसल इतनी बार बिकती है कि उसकी कीमत भी कई गुना बढ़ जाती है। इसकी भी क्या जरूरत है कि आम भारतीय सोने, चांदी, तांबे या क्रूड जैसे उत्पादों की रोजाना खरीद फरोख्त करे। क्या इसके बिना आम भारतीय का काम नहीं चल सकता। आज जिस तरह बुलियन, मैटल व क्रूड के भावों में भारी उतार चढाव हो रहा है और लोग जाने अनजाने इस वायदा बाजार की चमक देखकर इसमें
घुसते है पर वापस बाहर निकलना अफीम के नशे को छेडऩे जैसा है। मैने कुछ मनोचिकित्सकों से बात की तो पता लगा वायदा बाजार से जुड़े लोगों की संख्या ब्रेन हेमरेज, एन्जाईटी, घबराहट व नींद नहीं आने जैसी बीमारियों को लेकर बढ रही है। सवेरे 10 से रात्रि 11.30 बजे तक लगातार कम्प्यूटर पर रहने से आंखों के साथ सैक्सूअल कमजोरी भी आने की शिकायतें डॉक्टर से कर रहे है। हालात ये है की इसमे लगे लोग दूसरी फिजिकल मेहनत से भी कतराने लगे है। सेबी को चाहिए कि कमोडिटी ट्रेड की समय सीमा भी शेयर मार्केट की तरह हो, ताकि स्वस्थ व्यक्ति और स्वस्थ भारत की योजना भी धरातल पर दिखे।
..... उस दिन क्या होगा?
वायदा बाजार में सर्वाधिक गंभीर आशंका आपकी चिंता को कई गुना बढ़ा सकती है। देश मे किसी छोटी फसल जिसकी कीमत एक हजार करोड़ रुपए है और किसी बड़े सटोरियों ने इसे बारह सौ करोड़ में खरीदकर रख लिया तो सरकार क्या कर पाएगी। अब बाजी मार चुका सटोरिया चाहे तो उसे सौ रुपए किलो बेचे और चाहे तो हजार रुपए। यह सवाल जितनी बार उठा है, सरकार उतनी ही बार बैक फुट आर्ठ है। यह बड़ा खतरा है, जिससे मुंह फेरने के बजाय निराकरण करना जरूरी है। आज देश में जीरा, हल्दी, काली मिर्च, इलायची, ग्वार, मैंथी जैसी अनेक छोटी फसलें किसी उद्योगपति की नजर में चढ़ गई तो मुश्किल हो सकती है। हल्दी, जीरा, मैन्था, इलायची, कालीमिर्च, लालमिर्च, कैस्टर और धनियां जैसी वस्तुओं में इस हालात से बाजार दो -चार हो चुका है।

हाल की कुछ घटनाओं को देखें तो सीधा-सीधा समझ में आता है कि समर्थ लोगों ने किस तरह से वायदा बाजार में काम करने वाले छोटे व्यापारियों का जीना ***** कर दिया। और वहीं बड़ी कम्पनियां और विदेशी पूंजी आ जाएगी तो निश्चित तौर पर ये समर्थ लोग भी उसी चपेट में आ जाएंगे, जिसमें छोटे व्यापारी आए हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर जिस तरह आभासी खबरें मीडिया में चलती है, इससे भी वायदा कारोबार सीधा प्रभावित हो रहा है।

आज जरूरत इस बात की है कि लम्बी बहस हो, कि वायदा बाजार का स्वरूप क्या हो, किन जिसों का समावेश हो, कौनसी फसल आम उपभोक्ता को परेशान करती है, जैसी बातें खुलकर विचारित हो। और उसी के अनुरूप वापस इस ढांचे को बनाने या ढहाने के बारे में सोचे, तो किसान उपभोक्ता व आयातक-निर्यातक के हितों की रक्षा हो सकेगी। हर एक्सचेंज का अपना मार्केट वॉच नाम से एक ढांचा है, उसे भी सजग करने के बारे में सोचा जाए। और यह तय हो कि एक्सचेंजों से सौदों की गोपनीयता भंग नहीं हो। आज सभी एक्सचेंज अपना कारोबार बढ़ाने के लिए जागरुकता कार्यक्रम चला रहे हैं। जबकि जरूरत इस बात की है कि वो ध्यान रखे, कि कहीं संगठित ढांचा बनाकर कोई लूट तो नहीं रहा है।
ऐसे बनेगा आत्मनिर्भर भारत
किसानों को भेड़चाल से दूर रखा जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि किसानों को उनकी भूमि, पानी की स्थिती, बाजार में मांग आदि सब बातों का ध्यान रखते हुए फसल का चयन करना चाहिए। इसके लिए राज्यों की सरकारों को किसानों की मदद करनी होगी। जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने होंगे, जिससे किसान अपनी समझ विकसित कर जरूरत के हिसाब से फसल का उत्पादन सुनिश्चित कर सके। कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल पर भी रोक लगानी होगी। कीटनाशकों का उपयोग बढऩे से जहां फसल की लागत बढ़ती है, वहीं उसकी गुणवत्ता पर भी विपरीत असर पड़ता है। यही कारण है कि आज यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों में हम निर्यात के पैमानों पर खरे नहीं उतर रहे।
अच्छी गुणवत्ता युक्त पैदावार हो इसके लिए सरकार किसानों को सब्सीडी दे, तिलहन और दलहन की फसलों के नि:शुल्क बीज वितरण कार्यक्रम भी चलाए जाने चाहिए। इसके अलावा नदी जोडऩे की परियोजना को भी कागजों से निकाल कर उसे धरातल पर लाए जाने की कार्यवाई तत्काल शुरू की जानी चाहिए। यह परियोजना महंगी हो सकती है, लेकिन कृषि से मुंह मोड़ रहे युवाओं को फिर से खेती से जोडऩे और विदेशी मुद्रा कमाने के लिहाज से यह योजना महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।

कृषि चूंकि राज्य का मुद्दा है, इसलिए अलग-अलग राज्यों में फसलों की स्थिती को देख कर सटीक निर्णय लेना कठिन होता है। मेरा मानना है कि कृषि को केन्द्र सरकार के अधीन कर दिया जाना चाहिए। इससे कृषिगत विकास की एकरूपता और विकास की दर हासिल की जा सकेगी। कमोडिटी मार्केट, किसान, उपभोक्ताओं, व्यापारियों और उद्यमियों को लाभान्वित करने के लिए सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का होना नितांत आवश्यक है। आत्मनिर्भर भारत के लिए जहां कृषिगत उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, वहीं इन फसलों का निर्यात बढ़ा कर देश का आर्थिक ढांचा भी मजबूत बनाया जा सकेगा।

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