यहां लाठियों से पीटकर होता है कंस का वध

Krishna Janmashtami-

गली-मोहल्लों से मंदिरों में कृष्ण जन्म के दौरान हुआ कंस का वध

 

By: Vimal

Published: 14 Aug 2020, 12:46 AM IST

बीकानेर. भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन रात 12 बजे घर-घर और मंदिरों में भगवान कृष्ण की मूर्तियों और बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की मूर्तियों का पंचामृत से अभिषेक -पूजन कर कान्हा का भव्य श्रृंगार किया जाता है। घर-घर और मंदिरों में भगवान कृष्ण के जन्म की खुशियां मनाई जाती है। बधाईयां बांटी जाती है। बीकानेर में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मिट्टी से कंस बनाने और कृष्ण जन्म के दौरान कंस के वध करने की भी परम्परा है। बताया जा रहा है यह परम्परा दशकों से चल रही है।

 

 

मिट्टी से बनता है कंस
जन्माष्टमी के दिन बच्चे, युवा और बुजुर्ग तालाब की मिट्टी, सफेद मिट्टी और लाल मिट्टी से पानी की मटकियों के गोल हिस्से पर कंस की आकृति मिट्टी से बनाते है। कंस के सिंग, ललाट पर त्रिपुण्ड, आंखे, नाक, कान, मूंछ, मुंह और जीभ बनाई जाती है। काजल और कुमकुम से रंग किया जाता है। कंस के सत्तू का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर छोटे और कई स्थानों पर बड़े आकार के कंस बनाए जाते है। मरुनायक चौक स्थित रियासतकालीन मदन मोहन मंदिर और मरुनायक मंदिर में भी जन्माष्टमी के दिन कंस बनाए जाते है। कपडों से कंस के हाथ और पैर भी बनाए जाते है।

 

 

रात 12 बजे होता है वध
जन्माष्टमी के दिन जब रात के 12 बजे घर-घर कृष्ण जन्म की खुशियां मनाई जा रही होती है, उसी समय गली-मोहल्लों से मंदिरों तक में मिट्टी से बनाए गए कंस का लाठियों से पीटकर और हाथ से खरोंच कर वध किया जाता है। इस समय बच्चों से बुजुर्ग तक जय कन्हैया लाल की, हाथी घोड़ा पालकी, नन्द के आनन्द भयों, जय कन्हैया लाल की के गूंजायमान स्वर निकालते है और कान्हा के जन्म और कंस के वध की खुशियां मनाई जाती है।

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